भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c20.8
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c20.8
- Language
- Hindi
c20.8
यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा नरसिंहवर्मन् के समय के मामल्लपुरम् के छोटे छोटे ६ लेखों१, उसी वंश के राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के कैलासनाथ नामक मंदिर के शिलालेख२ तथा कूरम से मिले हुए उसी वंश के राजा परमेश्वरवर्मन् के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. नरसिंह-वर्मन् के लेखों में '**अ**' के तीन रूप मिलते हैं. राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के लेख के '**अ**' की बाईं तरफ़ के गोलाईदार अंश को मूल अक्षर से मिला देने से '**अ**' में ग्रंथि बन गई है. '**अ**' के उक्त तीन रूपों में से दूसरा मुख्य है और उसीको त्वरा से लिखने से पहिला और तीसरा रूप बना है जिनमें ग्रंथि मध्य में लगाई है. विसर्ग के स्थानापन्न दोनों आड़ी लकीरों को एक खड़ी लकीर से जोड़ दिया है. राजा राजसिंह के समय के कांचीपुरम् के लेख के लिखनेवाले ने अपनी लेखनकला की निपुणता का खूब परिचय दिया है. '**अ**' की खड़ी लकीर को दाहिनी ओर घुमा कर सिर तक ऊपर बढ़ा दिया है, '**आ**' की मात्रा की खड़ी रेखा को सुंदर बनाने के लिये उसमें विलक्षण घुमाव डाला है (देखो, टा, णा, मा, ला). परमेश्वरवर्मन् के कूरम के दानपत्र की लिपि त्वरा से लिखी हुई है उसमें '**ए**' और '**ज**' के नीचे के भाग में ग्रंथि भी लगी है और अनुस्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है.