भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c20.7
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c20.7
- Language
- Hindi
c20.7
मिलता है और इसीमें क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी (देखो, ऊपर पृ. ४३-४४). मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्गों की अपूर्णता के कारण संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे इसका नाम 'ग्रंथ लिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो. यह पल्लव, पांड्य, और चोल राजाओं, तथा चोल-वंशियों का राज्य छीननेवाले वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजा राजेंद्रचोड़ के वंशजों, गंगावंशियों, बाणवंशियों, विजयनगर के यादवों आदि के शिलालेखों या ताम्रपत्रों में मिलती है. यह लिपि प्रारंभ में तेलुगु-कनड़ी से बहुत कुछ मिलती हुई थी (लिपिपत्र ५२ में दी हुई राजा राजसिंह के कांचीपुरम् के लेख की लिपि को लिपिपत्र ४३ में दी हुई पल्लववंशी विष्णुगोपवर्मन् के उरुपुवल्लिर के दानपत्न की लिपि से मिला कर देखो), परंतु पीछे से चलती कलम से लिखने तथा खड़ी और आड़ी लकीरों को चक्र या रामदार रूप देने (देखो, ऊपर पृ. ८०) और कहीं कहीं उनके प्रारंभ, बीच या अंत में ग्रंथि लगाने के कारण इसके रूपों में विलक्षणता आती गई जिससे वर्तमान ग्रंथ लिपि वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियों से बिल्कुल भिन्न हो गई.