भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c21: १५—कलिंग लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c21
- Language
- Hindi
१५—कलिंग लिपि
c21.1
ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ५७ से ५६).
c21.2
५ ये मूल पंक्तियां श्रीरंगम् के लेख से हैं.
c21.3
कलिंग लिपि मद्रास इहाते के चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में कलिंगनगर के गंगा-वंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास से ११ वीं शताब्दी के आस पास तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र, जो अब तक मिला है, पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्र-वर्मन् का गांगेय संवत् ८७ का है. उसकी लिपि में मध्यप्रदेशी लिपि का अनुकरण पाया जाता है क्योंकि अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और कई अक्षर समकोण वाले हैं (देखो, ऊपर पृ. ४४). पिछले दानपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं किंतु पश्चिमी एवं तेलुगु-कनड़ी लिपि की नांई गोलाईदार मिलते हैं और उनमें तेलुगु-कनड़ी के साथ साथ कुछ ग्रंथ तथा नागरी लिपि का मिश्रण भी पाया जाता है.
c21.4
१ ये मूल पंक्तियां उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.
c21.5
४ ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३१२ और ३१३ के बीच के प्लेटों से.
c21.6
लिपिपत्र ५७ वां.
c21.7
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगवंशी राजा इंद्रवर्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र१, राजा इंद्रवर्मन् (दूसरे) के चिकाकोल के दानपत्र२ और राजा देवेंद्रवर्मन् के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. अच्युतपुरम् के दानपत्र के अक्षरों के सिर मध्यदेशी लिपि की नांई संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और अ, आ, क, र आदि अक्षर समकोणवाले हैं. ‘न’ नागरी का सा है और बाकी के अक्षर तेलुगु-कनड़ी से मिलते हुए हैं. चिकाकोल के दानपत्र के अक्षरों के भी सिर चौकूंटे, भीतर से भरे हुए हैं, और ‘म्’ ग्रंथ लिपि की शैली का है.
c21.8
३ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३२ और १३३ के बीच के प्लेटों से.
c21.9
लिपिपत्र ५७वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
c21.10
ओं स्वस्ति सर्व्वत्तुरमणीयाद्विजयकलिङ्गनगरात्सकलभुवन-
निर्माणैकसूत्रधारस्य भगवतो गोकर्णस्वामिनश्चरणकम-
लयुगलप्रणामादपगतकलिकलङ्को विनय्नयसम्पदा-
माधारः स्वासिधारापरिस्पन्दाधिगतसकलकलिङ्गाधिराज्यश्चतु-
रुदधितरङ्गमेखलावनितलप्रविततामलयशः अनेकसम-
c21.11
लिपिपत्र ५८ वां.
c21.12
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् दूसरे (अनंतवर्मन् के पुत्र) के गांगेय संवत् [२]५१५ और २५४६ के दो दानपत्रों से तय्यार किया गया है. पहिले दानपत्र के अक्षरों में ‘अ’ तीन प्रकार का है जिनमें से पहिले दो रूप नागरी हैं और तीसरा रूप तेलुगु-कनड़ी की शैली का है और लिपिपत्र ४६ में दिये हुए ‘अ’ के दूसरे रूप से मिलता हुआ है. उ, ए, ग (पहिला), ज (दूसरा), त (दूसरा), द और न (पहिला और दूसरा) नागरी से मिलते हुए ही हैं. दूसरे ताम्रपत्र के अक्षरों में से अ, आ, इ, ट, ध और ष नागरी के ही हैं.
c21.13
१ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १२८ और १२६ के बीच के प्लेटों से.
c21.14
२ इं. ऍ; जि. १३, पृ. १२२ और १२३ के बीच के प्लेटों से. इस लिपिपत्र में चिकाकोल के दानपत्र का संवत् गांगेय सं. १४६ छपा है जिसको शुद्ध कर पाठक १४८ पढें.
c21.15
४ ये मूल पंक्तियां राजा इंद्रवर्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र से हैं.
c21.16
६ इं. ऍ; जि. १८, पृ. १४४ और १४५ के बीच के प्लेटों से.
c21.17
लिपिपत्र ५८वें की मूल पंक्तियों७ का नागरी अक्षरांतर—
c21.18
५ इं. ऍ; जि. १३, पृ. २७४ और २७५ के बीच के प्लेटों से.
c21.19
७ ये मूल पंक्तियां देवेंद्रवर्मन् के गांगेय संवत् [२]५१ के दानपत्र से हैं.
c21.20
ओं स्वस्ति अमरपुरानुकारिण[:] सर्व्वत्तु(र्तु)सुखरम-
णीयाद्विजयवत[:] कलिङ्गा(ङ्ग)नगराध वासका[त्] महेन्द्राच-
लामलशिखरप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरो[:] सक-
लभुवननिर्माणैकसूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणि(णे)-
c21.21
यह लिपिपत्र गंगवंशी राजा वज्रहस्त के पर्लाकिमेडी के दानपत्र१ से तय्यार किया गया है. इस दानपत्र का लेखक उत्तरी और दक्षिणी शैली की भिन्न भिन्न लिपियों का ज्ञाता रहा हो और उसने इसमें अपने लिपिसंबंधी विशेष ज्ञान का परिचय देने के विचार से ही भिन्न भिन्न लिपियों का मिश्रण जान बूझ कर किया हो ऐसा अनुमान होता है. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. कीलहॉर्न ने इस दानपत्र का संपादन करते समय इसके अक्षरों की गणना कर लिखा है कि प्रायः ७३० अक्षरों में से ३२० नागरी में लिखे हैं और ४१० दक्षिणी लिपियों में२. प्राचीन लिपियों के सामान्य बोधवाले को भी इस लिपिपत्र के मूल अक्षरों को देखते ही स्पष्ट हो जायगा कि उनमें अ (पहिला), आ (पहिला), ई, उ, ऋ, क (पहिले तीन रूप), ग (पहिला), च (पहिला), ज (पहिला), ड (दूसरा), ण (पहिला), त (पहिला), द (पहिला व दूसरा), न (पहिला), प (पहिला), भ (पहिला), म (पहिला), र (पहिला व दूसरा), ल (पहिला), व (पहिला), श (पहिला व दूसरा), ष (पहिला), स (पहिला) और ह (पहिला व दूसरा) नागरी के ही हैं. दक्षिणी शैली के अक्षरों में से अधिकतर तेलुगु-कनड़ी हैं और ग्रंथ लिपि के अक्षर कम हैं जैसे कि 'ग' (पांचवां), ण (चौथा और पांचवां) और म (दूसरा).
c21.22
लिपिपत्र ५६वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c21.23
ओं स्वस्त्यमरपुरानुकारिणः सर्वर्तुसुखरमणी-
याद्विजयवतः कलिङ्गा(ङ्ग)नगरवासकान्महेन्द्राचलामलशिख-
रप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरोस्सकलभुवनिर्माणैक-
सूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणेर्भगवतो गोकर्णस्वामि-