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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c22: १६—तामिळ लिपि

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c22

Language
Hindi

१६—तामिळ लिपि

c22.1

१ ऐं. इं; जि. ३, पृ. २२० और २२२ के बीच के सेटों से.

c22.2

ई. स. की सातवीं शताब्दी से (लिपिपत्र ६०-६२).

c22.3

२ ऐं. इं; जि. ३, पृ. २२०.

c22.4

यह लिपि मद्रास के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथ लिपि प्रचलित थी वहां के तथा उक्त इहाते के पश्चिमी तट अर्थात् मलबार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में पल्लव, चोल, राजेन्द्रचोड आदि पूर्वी चालुक्य एवं राष्ट्रकूट आदि वंशों के शिलालेखों तथा दानपत्रों में एवं साधारण पुरुषों के लेखों में ई. स. की सातवीं शताब्दी से मिलती है. इस लिपि में 'अ' से 'औ'३ तक के स्वर, और व्यंजनों में केवल क, ङ, च, ञ, ट, ण, त, न, प, म, य र, ल, व, ळ, ऴ, ऱ और ऩ के चिह्न हैं. ग, ज, ड, द, ब और श के उच्चारण भी

c22.5

३ अब तक जितने लेख प्राचीन तामिळ लिपि के मिले हैं उनमें 'औ' अक्षर नहीं मिला परंतु संभव है कि जैसे 'उ' के सिर की दाहिनी ओर नीचे को झुकी हुई खड़ी लकीर लगा कर 'ऊ' बनाया जाता था (देखो, लिपिपत्र ६० में पल्लववंशी राजा नंदिवर्मन् के कशाकूडि के दानपत्र के अक्षरों में) वैसा ही चिह्न 'ओ' के साथ जोड़ने से 'औ' बनता होगा; क्योंकि वर्तमान तामिळ में जो चिह्न 'ऊ' बनाने में 'उ' के आगे लिखा जाता है वही 'औ' बनाने में 'ओ' के आगे रक्खा जाता है जो उक्त प्राचीन चिह्न का रूपांतर ही है.

c22.6

तामिळ भाषा में मिलते हैं परंतु उन अक्षरों के लिये स्वतंत्र चिह्न नहीं हैं. ‘ग’ की ध्वनि ‘क’ से, ‘ज’ और ‘श’ की ‘च’ से, ‘द’ की ‘त’ से और ‘ब’ की ‘प’ से व्यक्त की जाती है जिसके लिये विशेष नियम मिलते हैं. संयुक्त व्यंजन एक दूसरे से मिला कर नहीं किंतु एक दूसरे के पास लिखे जाते हैं और कई लेखों में हलंत और सस्वर व्यंजन का भेद नहीं मिलता, तो भी कितने एक लेखों में संयुक्त व्यंजनों में से पहिले के ऊपर बिंदी, वक्र या तिरछी रेखा लगा कर हलंत को स्पष्ट कर बतलाया है. अनुस्वार का काम अनुनासिक वर्णों से ही लिया जाता है. इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ ही हैं जिनमें से चार (ळ, ऴ, र और ण) को छोड़ देवें तो संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होनेवाले व्यंजनों में से तो केवल १४ ही रह जाते हैं. ऐसी दशा में संस्कृत शब्द इसमें लिखे नहीं जा सकते, इसलिये जब उनके लिखने की आवश्यकता होती है तब वे ग्रंथलिपि में ही लिखे जाते हैं. इसलिपि के अधिकतर अक्षर ग्रंथ लिपि से मिलते हुए ही हैं और ई, क, और र आदि अक्षर उत्तरी ब्राह्मी से लिये हों ऐसा प्रतीत होता है; क्योंकि उनकी खड़ी लकीरें सीधी ही हैं, नीचे के अंत से बाईं ओर मुड़ कर ऊपर को बढ़ी हुई नहीं हैं. अन्य लिपियों की नांईं इसमें भी समय के साथ परिवर्तन होते होते १० वीं शताब्दी के आस पास कितने एक और १४ वीं शताब्दी के आस पास अधिकतर अक्षर वर्तमान तामिळ से मिलते जुलते हो गये. फिर थोड़ा सा और परिवर्तन होकर वर्तमान तामिळ लिपि बनी. लिपिपत्र १ से ५६ तक के प्रत्येक पत्र में पाठकों के अभ्यास के लिये मूल शिलालेखों या दानपत्रों से पंक्तियां दी हैं परंतु लिपिपत्र ६० से ६४ तक के पांच लिपिपत्रों में वे नहीं दी गईं, जिसका कारण यही है कि संस्कृतज्ञ लोग उनका एक भी शब्द समझ नहीं सकते. उनको केवल वे ही लोग समझते हैं जिनकी मातृभाषा तामिळ है या जिन्होंने उक्त भाषा का अध्ययन किया है. तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं जिनसे तामिळ जाननेवालों को उस लिपि के प्राचीन लेखादि पढ़ने में सहायता मिल सकेगी.

c22.7

लिपिपत्र ६० वां.

c22.8

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा परमेश्वरवर्मन के कूरम के दानपत्र१ तथा उसी वंश के राजा नंदिवर्मन् के कशाक्कूड़ि२ और उदयेंदिरम्३ के दानपत्रों के अंत के तामिळ अंशों से तैयार किया गया है. कूरम के दानपत्न के अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ओ, च, ज, ए, त, न, प, य और व (पहिला) ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों की शैली के ही हैं. ‘अ’ और ‘आ’ में इतना ही अंतर है कि उन की खड़ी लकीरों को ऊपर की तरफ दोहराया नहीं है. इस अंतर को छोड़कर इस ताम्रपत्र के ‘अ’ और लिपिपत्र ५२ में दिये हुए मामल्लपुरम् के लेखों के ‘अ’ (दूसरे) में बहुत कुछ समानता है. क, ट, र और व (दूसरा) उत्तरी शैली की ब्राह्मी लिपि से मिलते हुए हैं. कशाक्कूड़ि के दानपत्र का ‘अ’ कूरम के दानपत्र के ‘अ’ की ग्रंथि को लंबा करने से बना है. उदयेंदिरम् के दानपत्र में हलंत और सस्वर व्यंजन में कोई भेद नहीं है.

c22.9

२ हु; सा. इं; इं; जि. ३, भाग ३, सेट १४-५, पंक्ति १०५-१३३ से.

c22.10

३ इं. ऐं; जि. ८, पृ. २७७ के पास के प्लेट की पंक्ति १०५-१०६ से.

c22.11

लिपिपत्र ६१ वां.

c22.12

१ हु; सा. इं; इं; जि. ३, भाग ३, प्लेट १२, पंक्ति ५७-८६ से.

c22.13

यह लिपिपत्र पल्लवतिलकवंशी राजा दंतिवर्मन् के समय के तिरुवेळ्ळरै के लेख४, राष्ट्रकूट

c22.14

४ ऐं. इं; जि. ११, पृ. १५७ के पास के प्लेट से.

c22.15

राजा कण्णरदेव (कृष्णराज तीसरे) के समय के तिरुक्कोवलूर१ और वेल्लूर२ के लेखों से तय्यार किया गया है. इसमें क, ङ, ट, ण, प, य और व में लिपिपत्र ६० से कुछ परिवर्तन पाया जाता है.

c22.16

लिपिपत्र ६२ वां.

c22.17

यह लिपिपत्र राजेन्द्रचोल(प्रथम) के तिरुमलै के चट्टान पर खुदे हुए लेख३, पगन (बर्मा में) से मिले हुए वैष्णव लेख४, विजयनगर के राजा विरूपाक्ष के शोरेक्कावुर के शक सं. १३०८ (ई. स. १३८७) के दानपत्र५ और महामंडलेश्वर वालककायम६ के शक सं. १४०३ (ई. स. १४८२) के जंबुकेश्वर के शिलालेख७ से तय्यार किया गया है. तिरुमलै के चट्टान के लेख का ‘ई’ उत्तरी शैली की ब्राह्मी का है क्योंकि उसकी दो बिंदियों के बीच की खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं ओर मुड़ कर ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ नहीं है. यह ‘ई’ प्रायः वैसा ही है जैसा कि मथुरा से मिले हुए संवत् ७६ के लेख८ में मिलता है, और महाक्षत्रप ईश्वरदत्त के सिक्कों (लिपिपत्र १०) और अमरावती के लेखों (लिपिपत्र १२) के ‘ई’ से भिन्न है क्योंकि उनमें खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं ओर ऊपर को मुड़ा हुआ मिलता है. विरूपाक्ष के दानपत्र और वालककामय के लेख के अक्षरों में से अधिकतर वर्तमान तामिळ अक्षरों से मिलते जुलते हो गये हैं.

c22.18

२ ऍ. इं; जि. ४, पृ. ८२ के पास के प्लेट से.

c22.19

५ ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के प्लेटों से.

c22.20

८ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२१ के पास के प्लेट चौथे में. इसी लेख की छाप उसी जिल्द के पृ. २०५ के पास के प्लेट (लेख संख्या २०) में छपी है परंतु उसमें ‘ई’ स्पष्ट नहीं आया.

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