भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s1.44
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s1.44
- Language
- Hindi
c25.s1.44
ऊपर लिखे हुए अंकसूचक संकेतों में १, २ और ३ के लिये क्रमशः **ए, द्वि और त्रि; स्व, स्ति और श्री; और ओं, न और मः** मिलते हैं; वे प्राचीन क्रम के कोई रूप नहीं है किंतु पिछले लेखकों के कल्पित हैं. उनमें से ए, द्वि और त्रि तो उन्ही अंकों के वाचक शब्दों के पहिले अक्षर हैं और स्व, स्ति और श्री तथा ओं, न और मः मंगल वाचक होने से इनको प्रारंभ के तीन अंकों का सूचक मान लिया है. एक ही अंक के लिये हस्तलिखित पुस्तकों में कई भिन्न अक्षरों के होने का कारण कुछ तो प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में और कुछ पुस्तकों से नक़ल करने में लेखकों की ग़लती है, जैसे २० के अंक का रूप ‘थ’ के समान था जिसकी आकृति पीछे से ‘घ’ से मिलती हुई होने से लेखकों ने ‘थ’ को ‘घ’, फिर ‘घ’ को ‘ध्व’ और ‘प’ पढ़ा होगा. इसी तरह दूसरे अंकों के लिये भी अशुद्धियां हुई होंगी.