भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s1.45
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s1.45
- Language
- Hindi
c25.s1.45
प्राचीन शिलालेखों और दानपत्रों में सब अंक एक पंक्ति में लिखे जाते थे परंतु हस्तलिखित पुस्तकों के पन्नों में चीनी अक्षरों की नांई एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. ई. स. की छठी शताब्दी के आस पास के मि. बावर के प्राप्त किये हुए पुस्तकों में भी पत्रांक इसी तरह एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. पिछले पुस्तकों में एक ही पत्रे पर प्राचीन और नवीन दोनों शैलियों से भी अंक लिखे मिलते हैं. पत्रे की दूसरी तरफ़ के दाहिनी ओर के ऊपर की तरफ़ के हाशिये पर तो अक्षरसंकेत से, जिसको अक्षरपल्ली कहते थे; और दाहिनी तरफ़ के नीचे के हाशिये पर नवीन शैली के अंकों से, जिनको अंकपल्लि कहते थे. इस प्रकार के अंक नेपाल, पाटण (अणहिलवाड़ा), खंभात और उदयपुर (राजपूताना में) आदि के पुस्तकमंडारों में रक्खे हुए पुस्तकों में पाये जाते हैं. पिछले हस्तलिखित पुस्तकों में अक्षरों के साथ कभी कभी अंक, तथा खाली स्थान के लिये शून्य भी लिखा हुआ मिलता है, जैसे कि ३३=(ला)/३, १००=(सु)/(°), १०२=(सु)/((°)/२), १३१=(सु)/((ला)/१), १५०=(सु)/(इ/(°)), २०६=(सू)/((°)/(वै)) आदि. नेपाल के बौद्ध, तथा गुजरात, राजपूताना आदि के जैन पुस्तकों में यही अक्षरक्रम ई. स. की १६ वीं शताब्दी तक कहीं कहीं मिल आता है और दक्षिण की मलयालम् लिपि के पुस्तकों३ में अब तक अक्षरों से अंक