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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.15

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.15

Language
Hindi

c25.s2.15

९ वू; इं. पे; पृ. ८२. मि. के ने ई. स. १८०७ के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के जर्नल में (पृ. ४७५-५०८) 'नोट्स ऑन इंडि-अन मैथेमॅटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र पर टिप्पण) नामक विस्तृत लेख में यह बतलाने का यत्न किया है कि भारतीय गणितशास्त्र अब तक जितना प्राचीन माना गया है उतना प्राचीन नहीं है और उसी लेख में भारतवर्ष के नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के विषय में लिखा है कि 'हम पूरी सत्यता के साथ कह सकते हैं कि हिंदुओं के गणित शास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (पृ. ४६३). मि. के के इस कथन में कुछ भी वास्तविकता नहीं है केवल हठधर्मी ही है क्योंकि ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ के आचार्य्य वराहमिहिर[^cont]
* द्विघनं शशिरस (६१) भक्तं द्वादशहीनं दिवसमानं (पंचसिद्धान्तिका १२।५). सप्ताश्विवेद (४७७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशु-क्लादौ (पं. सि; १।८). रोमकसूर्यो द्युगणात खतिथि (१५०) घ्नात्स पंचकर्तु (६५) परिवहीनात् । सप्ताष्टकषट्तकेंदियो (५६७८०) हुता-शाद्यप्तात्कंसः (पं. सि; १।९). रोमकयुगमर्केंद्वोर्वर्षाण्याकाशषट्पंचविषयाः (२८५०)। खाग्निशरा (१५०) द्विमासाः खरसविषयाश्वयः (२५६०) प्रजयाः (पं. सि; १। १५). आासन्नादासु सुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्द्विकपंचद्वियुतः (२५२६) शककालस्तस्य राज्ञः (वाराहीसंहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३). क्या उपर्युक्त उदाहरण, जिनमें कई जगह शून्य (०) का भी प्रयोग हुआ है, वराहमिहिर के समय अर्थात् ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ में नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना नहीं बतलाते? और सातवीं शताब्दी के लल्ल† तथा ब्रह्मगुप्त‡ के ग्रंथों में सैकड़ों जगह नवीन शैली से दिये हुए अंक मिलते हैं जिनको देखे बिना ही यह मनमानी कल्पना की गई है. प्राचीन लेख और दानपत्रों में यद्यपि अंक विशेष कर शब्दों में दिये जाते हैं तो भी ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आसपास से कहीं नवीन शैली से दिये हुए भी मिलते हैं. मि. के ने ई. स. ५६४ से लगा कर ८८२ तक के १६ लेखों की सूची अपने उक्त लेख में दी है जिनमें अंक नवीन शैली से दिये हुए हैं परंतु उनमें से प्रत्येक के अंकों में कुछ न कुछ दूषण लगा कर एक का भी ठीक होना स्वीकार नहीं किया (पृ. ४८२-८६) जिसका कारण यही है कि वे लेख उक्त कथन के विरुद्ध १० वीं शताब्दी से बहुत पूर्व के लेखों में भी नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना सिद्ध करते हैं. कोई कोई ताम्रपत्र जाली भी बने होते हैं क्योंकि उनके भूमि पर अधिकार रहता है परंतु शिलालेखों का बहुधा भूमि से संबंध होता ही नहीं इस लिये उनको कृत्रिम बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहती. शेरगढ़ (कोटाराज्य में) के दरवाज़े के पास की तिबारी की सीढ़ियों के पास एक ताक़ में लगे हुए सामंत देवदत्त के वि. सं. ८४७ (ई. स. ७६१) के लेख को मैंने देखा है उसमें नवीन शैली के संवत् के अंक बहुत स्पष्ट हैं. डॉ. फ़्लीट ने उसके संवत् के अंश की प्रतिकृति छापी है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३५१) जिसमें भी संवत् के अंक स्पष्ट हैं (डॉ. फ़्लीट ने ८३६ पढ़ा है वह अशुद्ध है). प्रतिहार नागभट के समय के बुचकला (जोधपुर राज्य में) के वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) के शिलालेख के संवत् के अंक (एं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का लेट), ग्वालियर् से मिले हुए प्रतिहार भोजदेव के समय के ई. स. ८७० के आस पास के शिला लेख के (जिसमें संवत् नहीं दिया) १ से २६ तक श्लोकांक (आ. स. ई; ई. स. १६०३-४, सेट ७२) और वहीं से मिले हुए उसी राजा के समय के वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७६) के शिलालेख में दिये हुए ६३३, १८७ और ५० के अंक सब के सब नवीन शैली से ही हैं (एं. इं; जि. १, पृ. १६० के पास का प्लेट). इन सब लेखों की उत्तम प्रतिकृतियां छपी हैं. उनमें दिये हुए अंकों को कोई विद्वान् संशययुक्त नहीं कह सकता. ऐसी दशा में मि. के की उपर्युक्त "पूर्ण सत्यता" में वास्तविक सत्यता का अंश कितना है इसका पाठक लोग स्वयं विचार कर सकेंगे.

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