भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s2.2
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.2
- Language
- Hindi
c25.s2.2
यह अंकक्रम भारतवर्ष में कब से प्रचलित हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो प्राचीन शैली से ही अंक लिखे मिलते हैं. नवीन शैली से लिखे हुए अंक पहिलेपहल कलचुरि सं. ३४६१ ( ई. स. ५६५ ) के दानपत्र में मिलते हैं, जिसके पीछे ई. स. की १० वीं शताब्दी के मध्य के आस पास तक कहीं प्राचीन और कहीं नवीन शैली के अंकों का व्यवहार है. उसके बाद नवीन शैली ही मिलती है. परंतु ज्योतिष के पुस्तकों में ई. स. की छठी शताब्दी से बहुत पूर्व इस शैली का प्रचार होना पाया जाता है क्योंकि शक सं. ४२७२ ( ई. स. ५०५ ) में वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें सर्वत्र नवीन शैली से ही अंक३ दिये हैं. यदि उस समय नवीन शैली का व्यवहार सामान्य रूप से न होता तो वराहमिहर अपने ग्रंथ में नवीन शैली से अंक न देता. इससे निश्चित है कि ई. स. की पांचवीं शताब्दी के अंत के आसपास तो नवीन शैली से अंक लिखने का प्रचार सर्वसाधारण में था परंतु शिलालेख और दानपत्रों के लिखनेवाले प्राचीन शैली के ढर्रे पर ही चलते रहे हों जैसा कि इस देश में हर बात में होता आया है. वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ में पुलिश, रोमक, वसिष्ठ, सौर ( सूर्य )