भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s2.3
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.3
- Language
- Hindi
c25.s2.3
१ संखेड़ा से मिले हुए गुर्जरवंशी किसी राजा के उक्त दानपत्र में संवत् ‘संवत्सरशतत्रयं(ये) षट्चत्वारिंशो- (शदु)त्तरेके । ३४६’ दिया है. जी. आर. के ने अपनी ‘इंडियन् मॅथेमॅटिक्स’ (भारतीय गणितशास्त्र) नामक पुस्तक में उक्त ताम्रपत्र के विषय में लिखा है कि ‘वह संदेहरहित नहीं है’ और टिप्पण में लिखा है कि ‘ये अंक पीछे से जोड़े गये हैं’ (पृ. ३१). मि. के का यह कथन सर्वथा स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उक्त दानपत्र को संदिग्ध मानने के लिये कोई कारण नहीं है और न कोई कारण मि. के ने ही बतलाया है. इसी तरह अंकों के पीछे से जोड़ने का कथन भी स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि जब संवत् शब्दों में दिया ही था तो पीछे से फिर उसको अंकों में बनाने की आवश्यकता ही न थी. हरिलाल हर्षदराय ध्रुव ने, जिसने उसका संपादन किया है, मूल ताम्रपत्र को देखा था परंतु उक्त विद्वान् को उन अंकों का पीछे से बनाया जाना मालूम न हुआ और न उसके फोटो पर से ऐसा पाया जाता है. मि. के की भारतीय गणितशास्त्र को नवीन ठहराने की खैंचतान ने ही इस और ऐसी ही और प्रमाणशून्य कल्पनाओं की सृष्टि कर दी है जिस- का कुछ परिचय आगे दिया जायगा. शब्दों और अंकों दोनों में संवत् देने की परिपाटी प्राचीन है और कई लेखादि में मिलती है; जैसे कि छार (चार) गांव से मिले हुए राजा हुविष्क के लेख में हुविस्क(ष्क)स्य स(संवत्सर चत(तु)रिश्र ४०’ (आ. स. रि; ई. स. १६०८-६, प्लेट ५६); गिरनार के पास के चट्टान पर खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख में ‘वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २’ (एं. इं. जि. ८, पृ. ४२) आदि.