भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c27.11
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c27.11
- Language
- Hindi
c27.11
गुरुमुखी लिपि—पंजाब के महाजनों तथा अन्य मामूली पढ़े हुए लोगों में पहिले एक प्रकार की 'लंडा' नाम की महाजनी लिपि प्रचलित थी, जिसमें सिंधी की नांई स्वरों की मात्राएं लगाई नहीं जाती थीं और जो अब तक वहां पर कुछ कुछ प्रचलित है. ऐसा कहते हैं कि सिक्खों के धर्मग्रंथ पहिले उसी लिपि में लिखे जाते थे जिससे वे शुद्ध पढ़े नहीं जाते थे, इसलिये गुरु अंगद (ई. स. १५३८-५२) ने अपने धर्मग्रंथों की शुद्धता के लिये स्वरों की मात्रावाली नई लिपि, जिसमें नागरी के समान शुद्ध लिखा और पढ़ा जावे, बनाई, जिससे उसको 'गुरुमुखी' अर्थात् 'गुरु के मुख से निकली हुई' लिपि कहते हैं. इसके अधिकतर अक्षर उस समय की शारदा लिपि से ही लिये गये हैं क्योंकि उ, ऋ, ओ, घ, च, छ, ट, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, भ, म, य, श, ष और स अक्षर अब तक वर्तमान शारदा से मिलते जुलते हैं. इसके अंक नागरी से लिये गये हैं. सिक्खों के धर्मग्रंथ इसीमें लिखे और छापे जाते हैं इतना ही नहीं किंतु नागरी के साथ साथ इसका प्रचार पंजाब में बढ़ रहा है.