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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s1.2

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s1.2

Language
Hindi

c30.s1.2

१ बौद्धों की जातक कथाओं में 'पण्ण' (पत्र, पत्ता, पन्ना) का उल्लेख कई जगह मिलता है (देखो, ऊपर पृ. ५, टिप्पण २, ३, ४) जो ताड़पत्र का ही सूचक होना चाहिये. हुएन्त्सांग के जीवनचरित से, जो उसीके, शिष्य ह्ली का बनाया हुआ है, पाया जाता है कि बुद्ध के निर्वाण के वर्ष में बौद्धों का जो पहिला संघ एकत्र हुआ (देखो, ऊपर पृ. ४, टिप्पण ६) उसमें बौद्धों का 'त्रिपिटक' ताड़पत्रों पर प्रथम लिखा गया था (बील अनुवादित हुएन्त्सांग का जीवनचरित, पृ. ११६-१७). ऐसा कह सकते हैं कि भारतवर्ष में लिखने के लिये सबसे पहिले ताड़पत्र ही काम में आया हो और प्रारंभ में उसपर दक्षिणी शैली से लोहे की तीखे गोल मुंह की शलाका से अक्षर कुचरना ही प्रतीत होता है क्योंकि 'लिख्' धातु का मूल अर्थ कुचरना, रगड़ना या रेखा करना ही है; स्याही से लिखने के लिये 'लिप्' धातु (लीपना, रंग पोतना) अधिक उपयुक्त है, अत एव संभव है कि ताड़पत्रों पर स्याही से लिखने की उत्तरी प्रथा पीछे की हो. संसकृत साहित्य के कई शब्द और मुहावरे सबसे प्राचीन पुस्तकों का ताड़पत्र पर ही होना सूचित करते हैं, जैसे कि एक विषय का पुस्तक 'ग्रंथ' या 'सूत्र' कहलाता था जो ताड़पत्रों के एक गांठ या एक डोरी से बंधे हुए होने का स्मरण दिलाता है; वृक्ष के पत्तों के संबंध से ही पुस्तक के विषयों का विभाग स्कंध, कांड, शाखा, वल्ली आदि शब्दों से किया गया है; पत्र (पन्ना) और पर्ण (पन्ना) शब्द भी वृक्षों के पत्तों के ही स्मारक हैं.