भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s1.3
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s1.3
- Language
- Hindi
c30.s1.3
तीखे गोल मुख की शलाका को उनपर दबा कर अक्षर कुरेदते थे. फिर पत्रों पर कज्जल फिरा देने से अक्षर काले बन जाते थे. कम लंबाई के पत्रों के मध्य में एक, और अधिक लंबाईवालों के मध्य से कुछ अंतर पर दाहिनी और बाईं ओर एक एक, छिद्र किया जाता था. पुस्तकों के नीचे और ऊपर उसी अंदाज़ के सूराखवाली लकड़ी की पट्टियां रहती थीं. इन सूराखों में डोरी डाली जाने से एक माप की एक या अधिक पुस्तकें एकत्र बंध सकती थीं. पढ़ने के समय. डोरी को ढीला करने से प्रत्येक पन्ना दोनों ओर से आसानी के साथ उलटाया तथा पढ़ा जा सकता था. सुंदर सस्ते कागज़ों के प्रचार के साथ ताड़पत्रों का प्रचार कम होता गया और अब तो बंगाल में कोई कोई 'दुर्गा-पाठ' लिखने में ही उन्हें काम में लेते हैं. भारत के सब से दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी हिस्सों की प्रारंभिक पाठशालाओं में विद्यार्थियों के लिखने में या रामेश्वर, जगदीश आदि के मंदिरों में जमा कराये हुए रुपयों की रसीदें देने आदि में ताड़पत्र अब भी काम में आते हैं. दक्षिण की अधिक उष्ण हवा में ताड़पत्र के पुस्तक उतने अधिक समय तक रह नहीं सकते जितने कि नेपाल आदि शीत देशों में रह सकते हैं.