भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s16.7
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s16.7
- Language
- Hindi
c30.s16.7
२ द्वितीय राजतरंगिणी का कर्ता जोनराज अपने ही एक मुक़द्दमे के विषय में लिखता है कि '[मेरे दादा] लोलराज ने किसी कारण से अपनी दस प्रस्थ भूमि में से एक प्रस्थ भूमि किसी को बेची और अपने नोनराज आदि बालक पुत्रों को यह कह कर उसी वर्ष वह मर गया. नोनराज आदि को असमर्थ देख कर भूमि ख़रीदनेवाले एक के बदले ज़बर्दस्ती से दसों प्रस्थ भोगते रहे और उसके लिये उन्होंने यह जाल बना लिया कि विक्रयपत्र (बैनामे) में लिखे हुए ‘भूप्रस्थमेकं विक्रीतं’ में ‘म’ के पूर्व रेखारूप से लगनेवाली ‘ए’ की मात्रा[^asterisk] को ‘द’ और ‘म’ को ‘श’[^dagger] बना दिया, जिससे विक्रयपत्र में ‘भूप्रस्थमेकं’ का ‘भूप्रस्थदशकं’ हो गया. मैंने यह मामला उस राजा (जैनोल्लाभद्दीन; ज़ैन-उल्-आबदीन) की राजसभा में पेश किया तो राजा ने भूर्जपत्र पर लिखे हुए विक्रयपत्र को मंगवा कर पढ़ा और उसे पानी में डाल दिया तो नये अक्षर घुल गये और पुराने ही रह गये जिससे ‘भूप्रस्थमेकं’ ही निकल आया. इस [न्याय] से राजा को कीर्ति, मुझको भूमि, जाल करनेवालों को अद्भुत दंड, प्रजा को सुख और दुष्टों को भय मिला’ (जोनराजकृत राजतरंगिणी, श्लोक १०२५-३७). इससे यह पाया जाता है कि या तो कश्मीरवाले तीन पीढ़ी में ही पक्की स्याही बनाने की विधि भूल गये थे, या भूर्जपत्र पर की स्याही जितनी पुरानी हो उतने ही अक्षर दृढ़ हो जाते थे या अधिक संभव है कि पंडित लोलराज की पुस्तक लिखने की स्याही, जिससे विक्रयपत्र लिखा गया था, पक्की थी और दूसरी स्याही, जिससे जाल किया गया, कच्ची थी. [^asterisk]: शारदा (कश्मीरी) एवं अन्य प्राचीन लिपियों में पहिले ‘ए’ की मात्रा का चिह्न छोटी या बड़ी खड़ी लकीर भी था जो व्यंजन के पहिले लगाया जाता था (देखो, लिपिपत्र २८ में ‘शे’; २६ में ‘दे’; ३० में दिये हुए अरिगांव के लेख के अक्षरों में ‘ते’).
Cites (1)
- Rājataraṅgiṇī — Kalhaṇa, Sanskrit