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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s2: भूर्जपत्र ( भोजपत्र )

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s2

Language
Hindi

भूर्जपत्र ( भोजपत्र )

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भूर्जपत्न (भोजपत्र)—'भूर्ज' नामक वृक्ष की, जो हिमालय प्रदेश में बहुतायत से होता है, भीतरी छाल है. सुलभता तथा नाममात्र के मूल्य से बहुत मिलने के कारण प्राचीन काल में वह पुस्तक, पत्र आदि के लिखने के काम में बहुत आता था. अल्बेरूनी लिखता है कि 'मध्य और उत्तरी भारत के लोग 'तूज़' (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं. उसको 'भूर्ज' कहते हैं. वे उसके प्रायः एक गज़ लंबे और एक बालश्त चौड़े पन्ने लेते हैं और उनको भिन्न भिन्न प्रकार से तय्यार करते हैं. उनको मज़बूत और चिकना बनाने के लिये वे उनपर तेल लगाते हैं और [घोट कर] चिकना करते हैं, फिर उनपर लिखते हैं७.' भूर्जपत्र लंबे चौड़े निकल आते हैं जिनको काट कर लेखक अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पन्ने बनाते और

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७ सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७१.

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उनपर स्याही से लिखते थे. ताड़पत्रों का अनुकरण कर भूर्जपत्र की पुस्तकों के प्रत्येक पन्ने का मध्य का हिस्सा खाली छोड़ा जा कर उसमें छेद किया जाता था. पुस्तक के ऊपर और नीचे रक्खी जानेवाली लकड़ी की पार्टियों में भी उसी अंदाज़ से छेद रहता था. इस प्रकार सब पन्नों के छेदों में डोरी पोई जाकर पार्टियों पर लपेट ली जाती थी. मुगलों के समय से कश्मीरवाले भूर्जपत्र के पुस्तकों पर वर्तमान किताबों की नांई चमड़े की जिल्दें भी बांधने लगे. सस्ते और सुंदर कागजों के प्रचार के साथ भूर्जपत्र पर पुस्तकें लिखने की प्रथा कम होती गई और अब तो केवल हिंदुओं में तावीज़ों के लिये यंत्र लिखने के काम में उसका प्रचार रहा है जिससे हरेक बड़े शहर में पन्सारियों आदि की दुकानों पर वह मिल आता है.

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भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें विशेष कर कश्मीर में मिलती हैं और कुछ उड़ीसा आदि में. हिंदुस्तान में पूना आदि के तथा यूरोप के कई प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकसंग्रहों में भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें सुरक्षित हैं जो बहुधा कश्मीर से ही ली गई हैं. भूर्जपत्र पर लिखी हुई सब से पुरानी पुस्तक, जो अब तक मिली है, खोतान से मिला हुआ खरोष्ठी लिपि के 'धंमपद' (प्राकृत) का कुछ अंश है. वह ई. स. की दूसरी या तीसरी शताब्दी का लिखा हुआ होना चाहिये. 'संयुक्तागमसूत्र' (संस्कृत) ई. स. की चौथी शताब्दी का लिखा हुआ मिला है१०. मि. बावर के पुस्तक ई. स. की छठी शताब्दी के आस-पास के और बख्शाली का अंकगणित ई. स. की ८ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. ये पुस्तक स्तूपों के भीतर रहने या पत्थरों के बीच गड़े रहने से ही इतने दीर्घकाल तक बचने पाये हैं परंतु खुले रहनेवाले भूर्जपत्र के पुस्तक ई. स. की १५वीं शताब्दी के पूर्व के नहीं मिलते जिसका कारण यही है कि भूर्जपत्र, ताड़पत्र या कागज़ जितना टिकाउ नहीं होता.