भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s2.3
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s2.3
- Language
- Hindi
c30.s2.3
उनपर स्याही से लिखते थे. ताड़पत्रों का अनुकरण कर भूर्जपत्र की पुस्तकों के प्रत्येक पन्ने का मध्य का हिस्सा खाली छोड़ा जा कर उसमें छेद किया जाता था. पुस्तक के ऊपर और नीचे रक्खी जानेवाली लकड़ी की पार्टियों में भी उसी अंदाज़ से छेद रहता था. इस प्रकार सब पन्नों के छेदों में डोरी पोई जाकर पार्टियों पर लपेट ली जाती थी. मुगलों के समय से कश्मीरवाले भूर्जपत्र के पुस्तकों पर वर्तमान किताबों की नांई चमड़े की जिल्दें भी बांधने लगे. सस्ते और सुंदर कागजों के प्रचार के साथ भूर्जपत्र पर पुस्तकें लिखने की प्रथा कम होती गई और अब तो केवल हिंदुओं में तावीज़ों के लिये यंत्र लिखने के काम में उसका प्रचार रहा है जिससे हरेक बड़े शहर में पन्सारियों आदि की दुकानों पर वह मिल आता है.