भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s7.38
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s7.38
- Language
- Hindi
c31.s7.38
१ 'ज्योतिर्विदाभरण' का कर्त्ता कालिदास नामक ज्योतिषी उक्त पुस्तक के २२ वें अध्याय में अपने को उज्जैन के राजा विक्रम का मित्र (श्लोक १६) और 'रघुवंश' आदि तीन काव्यों का कर्ता बतला कर (श्लो. २०) गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) के वैशाख में उक्त पुस्तक का प्रारंभ और कार्तिक में उसकी समाप्ति होना (श्लो. २१) लिखता है. उसमें विक्रम के विषय में यह भी लिखा है कि 'उसकी सभा में शंकु, वररुचि, मणि, अंशु, जिष्णु, त्रिलोचन, हरि, घटखर्पर और अमरसिंह आदि कवि (श्लो. ८); सत्य, वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ और कुमारसिंह आदि ज्योतिषी थे (श्लो. ६). धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि ये नव विक्रम की सभा के रत्न थे. उसके पास ३००००००० पैदल, १०००००००० सवार, २४३०० हाथी और ४००००० नाव थीं (श्लो. १२). उसने ६५ शक राजाओं को मार कर अपना शक अर्थात् संवत् चलाया (श्लो. १३) और रूम देश के शक राजा को जीत कर उज्जैन में लाया परंतु फिर उसको छोड़ दिया' (श्लो. १७). यह सारा कथन मनघडंत ही है क्यों कि 'ज्योतिर्विदाभरण' की कविता मामूली है और रघुवंश आदि के कर्ता कविशिरोमणि कालिदास की अलौकिक सुंदरतावाली कविता के आगे तुच्छ है. ऐसे ही गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) में उक्त पुस्तक की रचना करने का कथन भी कृत्रिम ही है क्यों कि उसी पुस्तक में अयनांश निकालने के लिये यह नियम दिया है कि 'शक संवत् में से ४४५ घटाकर शेष में ६० का भाग देने से अयनांश आते हैं' (शाकः शराम्भोधिधुगोनिता हृता मानं खतर्कैरयनांशकाः स्मृताः । १२ । १६). विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला था अत एव यदि वह पुस्तक वि. सं. २४ में बना होता तो उसमें शक संवत् का नाम भी नहीं होना चाहिये था. वास्तव में वह पुस्तक श. सं. १२१४ (वि. सं. १२६६=ई. स. १२९२) के आसपास का बना हुआ है (देखो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित का 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र', पृ. ४७६). ऐसी दशा में उक्त पुस्तक का विक्रमसंबंधी सारा कथन कल्पित ही मानना पड़ता है.