भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.11
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.11
- Language
- Hindi
c4.11
प्रारंभ में इस देश में प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य हुआ वह भिन्न भिन्न विद्वानों और समाजों के द्वारा ही होता रहा. ई. स. १८४४ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने सरकारी तौर से भी इस कार्य का किया जाना आवश्यक समझ कर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में निवेदन किया और ई. स. १८४७ में लॉर्ड हार्डिंग्ज के प्रस्ताव पर ‘बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स’ ने इस काम के लिये खर्च की मंजूरी दी परंतु ई. स. १८६० तक उसका वास्तविक फल कुछ भी न हुआ. ई. स. १८६१ में संयुक्त प्रदेश के चीफ़ इंजीनियर कर्नल ए. कनिंगहाम ने इस विषय की योजना तय्यार कर भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की सेवा में पेश की जो स्वीकृत हुई और सरकार की ओर से ‘आर्किऑलॉजिकल सर्वे’ नामक महकमा कायम हुआ तथा जनरल कनिंगहाम उसके अध्यक्ष नियत हुए. सरकार के इस बड़े उपयोगी कार्य को हाथ में लेने से प्राचीन शोध के काम में बहुत कुछ उन्नति हुई. जनरल कनिंगहाम ने उत्तरी और डॉ. जेम्स बर्जेस ने पश्चिमी व दक्षिणी भारत में प्राचीन शोध का कार्य किया. इन दोनों विद्वानों ने कई उत्तम रिपोर्टें छाप कर बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की. ई. स. १८७२ से डॉ. बर्जेस ने ‘इंडियन ऐंटिक्वेरी’ नामक भारतीय प्राचीन शोध का मासिक पत्र निकालना प्रारंभ किया जो अब तक चल रहा है और जिसमें प्राचीन शोध संबंधी लेखों के अतिरिक्त अनेक शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्के छप चुके हैं. ई. स. १८७७ में गवर्नमेंट की तरफ से जनरल कनिंगहाम ने उस समय तक मौर्य वंशी राजा अशोक के जितने शिलालेख मालूम हुए थे उनका एक पुस्तक और ई. स. १८८८ में जे. एफ़. फ्लीट ने गुप्तों और उनके समकालीन राजाओं के शिलालेखों तथा दानपत्रों का अनुपम ग्रंथ प्रकट किया. उसी वर्ष से आर्किऑलॉजिकल सर्वे के महकमे से ‘ऐपियाफ़िआ इंडिका’ नामक त्रैमासिक पुस्तक का छपना प्रारंभ हुआ, जिसमें केवल शिलालेख और दानपत्र ही प्रकट होते हैं. इस समय इसकी १४ वीं जिल्द छप रही है. प्राचीन इतिहास के लिये ये जिल्दें रत्नाकर के समान हैं. ऐसे ही उसी महकमे की ओर से ई. स. १८६० से ‘साउथ इंडियन इन्स्क्रिप्शन्स’ नामक पुस्तक का छपना भी प्रारंभ हुआ, जिसमें दक्षिण के संस्कृत, तामिळ आदि भाषाओं के शिलालेख और दानपत्र छपते हैं और जिसकी ८ हिस्सों में ३ जिल्दें अब तक छप चुकी हैं. ये भी बड़े महत्व की हैं.