भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.10
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.10
- Language
- Hindi
c4.10
एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के द्वारा कार्य आरंभ होते ही कई विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों के शोध में लगे. कितने एक विद्वानों ने यहां के ऐतिहासिक शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्कों का टटोलना शुरू किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर विद्वानों की दृष्टि पड़ी. भारतवर्ष जैसे विशाल देश में लेखनशैली के प्रवाह ने लेखकों की भिन्न रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण किये थे जिससे प्राचीन ब्राह्मी लिपि से गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग तामिळ आदि अनेक लिपियां निकलीं और समय समय पर उनके कई रूपांतर होते गये जिससे सारे देश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना कठिन हो गया था; परंतु चार्ल्स विल्किन्स, पंडित राधाकांत शर्मा, कर्नल जेम्स टॉड के गुरु यति ज्ञानचंद्र, डॉक्टर बी. जी. बॅबिंगटन्, वॉल्टर इलिअट्, डा. मिल, डब्लयू. ऍच. वॅथन्, जेम्स प्रिन्सेप आदि विद्वानों ने ब्राह्मी और उससे निकली हुई उपर्युक्त लिपियों को बड़े परिश्रम से पढ़ कर उनकी वर्ण- मालाओं का ज्ञान प्राप्त किया. इसी तरह जेम्स प्रिन्सेप, मि॰ नॉरिस तथा जनरल कर्निंगहाम आदि विद्वानों के श्रम से विदेशी खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला भी मालूम हो गई. इन सब विद्वानों का यत्न प्रशंसनीय है परंतु जेम्स प्रिन्सेप का अगाध श्रम, जिससे अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का तथा खरोष्ठी लिपि के कई अक्षरों का ज्ञान प्राप्त हुआ, विशेष प्रशंसा के योग्य है. (प्राचीन लिपियों के पढ़े जाने के वृत्तान्त के लिये देखो, इस पुस्तक के पृष्ठ ३७-४१).
Linked texts (1)
- Abhijñānaśākuntala — Kālidāsa, Sanskrit