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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.27

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.27

Language
Hindi

c4.27

इस पुस्तक का क्रम ऐसा रक्खा गया है कि ई. स. की चौथी शताब्दी के मध्य के आसपास तक की समस्त भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी रक्खी है. उसके बाद लेखनप्रवाह स्पष्ट रूप से दो स्रोतों में विभक्त होता है, जिनके नाम 'उत्तरी' और 'दक्षिणी' रक्खे हैं. उत्तरी शैली में गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा और बंगला लिपियों का समावेश होता है और दक्षिणी में पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग और तामिळ लिपियां हैं. इन्हीं मुख्य लिपियों से भारतवर्ष की समस्त वर्तमान (उर्दू के अतिरिक्त) लिपियां निकली हैं. अंत में खरोष्ठी लिपि दी गई है. १ से ७० तक के लिपिपत्रों के बनाने में क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम स्वर, फिर व्यंजन, उसके पीछे क्रम से हलंत व्यंजन, स्वरमिलित व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के चिह्नों सहित व्यंजन और अंत में 'ओं' का सांकेतिक चिह्न (यदि हो तो) दिया गया है. १ से ५६ तक और ६५ से ७० तक के लिपिपत्रों में से प्रत्येक के अंत में अभ्यास के लिये कुछ पंक्तियां मूल लेखादि से उद्धृत की गई हैं. उनमें शब्द समासों के अनुसार अलग अलग इस विचार से रक्खे गये हैं कि विद्यार्थियों को उनके पढ़ने में सुभीता हो. उक्त पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर भी पंक्ति क्रम से प्रत्येक लिपिपत्र के वर्णन के अंत में दे दिया है जिससे पढ़नेवालों को उन पंक्तियों के पढ़ने में कहीं संदेह रह जाय तो उसका निराकरण हो सकेगा. उन पंक्तियों में जहां कोई अक्षर अस्पष्ट है अथवा छूट गया है अक्षरांतर में उसको [ ] चिह्न के भीतर, और जहां कोई अशुद्धि है उसका शुद्ध रूप ( ) चिह्न के भीतर लिखा है. जहां मूल का कोई अंश जाता रहा है वहां......ऐसी बिंदियां बनादी हैं. जहां कहीं 'ङ्ख' और 'ङ्घ' संयुक्त व्यंजन मूल में संयुक्त लिखे हुए हैं वहां उनके संयुक्त टाइप न होने से प्रथम अक्षर को हलंत रखना पड़ा है परंतु उनके नीचे आड़ी लकीर बहुधा रख दी गई है जिससे पाठकों को मालूम हो सकेगा कि मूल में ये अक्षर एक दूसरे से मिला कर लिखे गये हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि उक्त लिपिपत्रों के अंत में दी हुई मूल पंक्तियों को पढ़ लेनेवाले को कोई भी अन्य लेख पढ़ लेने में कठिनता न होगी. लिपिपत्र ६० से ६४ में मूल पंक्तियां नहीं दी गईं जिसका कारण यह है कि उनमें तामिळ तथा वट्टेलुत्तु लिपियां दी गई हैं. वर्णों की कमी के कारण उन लिपियों में संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, वे केवल तामिळ ही में काम दे सकती हैं और उनको तामिळ भाषा जाननेवाले ही समझ सकते हैं, तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं, जिनसे तामिळ जाननेवालों को उन लिपियों के लेखादि के पढ़ने में सहायता मिल सकेगी.