Pramāṇa · Search · About · API

भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.5

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.5

Language
Hindi

c4.5

देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने अशोक के लेखवाले दो स्तंभ ला कर देहली में खड़े करवाये. उनपर के लेखों का आशय जानने के लिये सुल्तान ने बहुत से विद्वानों को एकत्र किया; परंतु वे उन लेखों को न पढ़ सके. ऐसा भी कहते हैं कि बादशाह अकबर को भी उन लेखों का आशय जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान् ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता. प्राचीन लिपियों का पढ़ना भूल जाने के कारण जब कहीं ऐसा प्राचीन लेख मिल आता है कि जिसके अक्षर पढ़े नहीं जाते तो उसको देख कर लोग अनेक कल्पना करते हैं. कोई उसके अक्षरों को देवताओं के अक्षर बतलाते हैं, कोई गड़े हुए धन का बीजक कहते और कोई उसको सिद्धिदायक यंत्र बतलाते हैं. इस अज्ञान के कारण प्राचीन वस्तुओं की कुछ भी कद्र न रही इतना ही नहीं किंतु टूटे हुए मंदिरों आदि के शिलालेख तोड़ फोड़ कर कहीं मामूली पत्थरों की तरह चुनाई के काम में लाये गये; कहीं उनकी भंग, मसाला आदि पीसने की सिलाएं बनाई गईं; और कहीं नये मंदिर, मकान आदि की सीढ़ियां, छपने आदि बनाने में भी वे काम में लाये गये जिसके अनेक उदाहरण मिले हैं. कई प्राचीन ताम्रपत्र तांबे के भाव बेचे जा कर उनके बरतन बनाये गये. सोने चांदी के असंख्य सिक्के गलाये जा कर उनके जेवर बने और अब तक बनते जाते हैं. तांबे के प्राचीन सिक्के तो अब तक सालाना मनों गलाये जाते हैं.