भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.6
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.6
- Language
- Hindi
c4.6
विद्या की अवनति के साथ हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बची खुची सामग्री की यह दशा हुई. प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों का मिलना भी सर्व साधारण के लिये कठिन हो गया जिस-से प्रायः १७५ वर्ष ही पहिले तक इस देश के मुसलमानों के पूर्व के इतिहास की यह दशा थी कि विक्रम, बाप्पा रावल, भोज, सिद्धराज जयसिंह, पृथ्वीराज, जयचंद, रावल समरसी (समरसिंह) आदि प्रसिद्ध राजाओं के नाममात्र सुनने में आते थे परंतु यह कोई नहीं जानता था कि वे कब हुए और उनके पहिले उन वंशों में कौन कौन से राजा हुए. भोज का चरित्र लिखनेवाले बल्लाल पंडित को भी यह मालूम न था कि मुंज (वाक्पतिराज) सिंधुराज (सिंधुल) का बड़ा भाई था और उसके मारे जाने पर सिंधुराज को राज्य मिला था, क्यों कि ‘भोजप्रबन्ध’ में सिंधुल (सिंधुराज) के मरने पर उसके छोटे भाई मुंज का राजा होना लिखा है. जब भोज का इतिहास लिखनेवाले को भी भोज के वंश के इतिहास का सामान्य ज्ञान भी न था तब सर्व साधारण में ऐतिहासिक ज्ञान की क्या अवस्था होनी चाहिये यह सहज ही अनुमान हो सकता है. ऐसी दशा में बड़वों (भाटों), जागों आदि ने राजाओं की ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पूर्व की वंशावलियां गढ़ंत कर सैंकड़ों मन-माने नाम उनमें दर्ज कर दिये और वे पुस्तक भी इतिहास के सच्चे साधन और अमूल्य समझे जा कर बहुत गुप्त रक्खे जाने लगे.