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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.8

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.8

Language
Hindi

c4.8

ई. स. १७८४ में सर विलियम जोन्स के यत्न से एशिया के इतिहास, शिल्प, साहित्य आदि के शोध के लिये कलकत्ते में 'एशियाटिक सोसाइटी बंगाल' नाम का समाज स्थापित हुआ. तब से ही भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की खोज का प्रारंभ हुआ मानना चाहिये. कई अंग्रेज़ और देशी विद्वानों ने समाज का उद्देश सफल करने को लेख लिखे जो ई. स. १७८८ में 'एशियाटिक रिसर्चेस' (एशियासंबंधी शोध) नामक ग्रंथमाला की पहिली जिल्द में प्रकाशित हुए और ई. स. १७६७ तक उक्त ग्रंथमाला की ५ जिल्दें प्रकट हुई. ई. स. १७६८ में उनका नया संस्करण चोरी से ही इंग्लैंड में छापा गया. उनकी मांग यहां तक बढ़ी कि पांच छः बरसों में ही उनके दो और संस्करण छप गये और ऍम. ए. लंबॉम् नामक विद्वान् ने 'रिसर्चेज् एशियाटिक्स' नाम से उनका फ्रेंच अनुवाद भी छाप डाला जिसकी बहुत कुछ प्रशंसा हुई. ई. स. १८३६ तक उक्त ग्रंथमाला की २० जिल्दें छप गईं फिर उसका छपना तो बंद हो गया परंतु ई. स. १८३२ से 'जर्नल ऑफ़ दी एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' नामक उक्त समाज का सामयिक पत्र निकलना प्रारंभ हुआ जो अब तक साक्षर वर्ग की बड़ी सेवा कर रहा है.