भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.9
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.9
- Language
- Hindi
c4.9
इस प्रकार उक्त समाज के द्वारा एशिया के प्राचीन शोध की ओर यूरोप में भी विद्वानों का ध्यान गया और ई. स. १८२३ के मार्च में लंदन नगर में उसी उद्देश से 'रॉयल एशियाटिक सोसाइटी' नामक समाज स्थापित हुआ और उसकी शाखाएं बंबई और सीलोन में भी स्थापित हुईं. ऐसे ही समय समय पर फ्रान्स, जर्मनी, इटली आदि यूरोप के अन्य देशों तथा अमेरिका, जापान आदि में भी एशियासंबंधी भिन्न भिन्न विषयों के शोध के लिये समाज स्थापित हुए जिनके जर्नलों (सामयिक पुस्तकों) में भारतवर्ष के प्राचीन शोधसंबंधी विषयों पर अनेक लेख प्रकट हुए और होते ही जा रहे हैं. यूरोप के कई विद्वानों ने चीनी, तिब्बती, पाली, अरबी आदि भाषाएं पढ़ कर उनमें से जो कुछ सामग्री भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालनेवाली थी वह एकत्रित कर बहुत कुछ प्रकाशित की.