भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.145
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.145
- Language
- Hindi
c7.145
राजसूय यज्ञ में यजमान के हाथ में पांच पासे 'अभिभूरसि' (तू जीतने वाला है) इस मन्त्र (यजु. वाज. सं. १०. २८) से दिए जाते थे. फिर वहीं यज्ञभूमि में जुआ खिलाया जाता था. या तो वेही पांच पासे डलाये जाते थे (शतपथ ब्राह्मण, ५. ४. ४. २३) या 'कृतादि (चार पासे का) द्यूत' कराया जाता था जिसमें राजा के हाथ से कृत और सजात (उसी गोत्र के ज़मींदार) से कलि का पासा डलवाते, जिससे सजात की हार हो जाती (क्योंकि सजातों पर ही राजा की प्रधानता दिखाना उद्देश्य था) और उसकी गौ, जो जूए में लगाई थी, जीत ली जाती. (द्यूतभूमौ हिरण्यं निधायाभिजुहोति......'अक्षाशिवप-ति......मां दीव्यध्वमित्याह. कृतादि वा निदध्याद्। अप्स्रतिभ्यः सजाताय कलिम्. गामस्य घ्नन्ति. कात्यायन श्रौतसूत्र, १५. १५-२०).
'कृत' शब्द चार के अर्थ में भी इसी से आने लगा, जैसे शतपथ ब्राह्मण में 'चतुष्टोमेन कृतेनायनानां' (१३. ३. २. १); तैत्तिरीय ब्राह्मण में 'ये वै चत्वारः स्तोमाः कृतं तत्' (१.५. ११. १).