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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.146

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.146

Language
Hindi

c7.146

८ एक-पर, द्वा-पर, त्रे-ता के अर्थ स्पष्ट हैं. पाणिनि के एक सूत्र अक्षशलाकासंख्याः परिणा २. १. १०) से जाना जाता है कि अक्ष-परि, शलाका-परि, और संख्यावाचक शब्दों के साथ 'परि' के समास से बने हुए (एकपरि, द्विपारि, आदि) शब्द काम में आते थे. इस सूत्र के व्याख्यान में कात्यायन और पतंजलि ने लिखा है कि जुआरियों के (सांकेतिक) व्यवहार में ये प्रयोग काम में आते थे और इनका भाव यह है कि पहले का सा जुआ नहीं हुआ (अर्थात् खेल में हार गये). अक्ष और शलाका शब्दों से 'परि' का समास एकवचन में ही होता है. इससे सिद्ध है कि द्वि-परि का अर्थ 'दो पासों से पहले का सा खेल नहीं हुआ' यह नहीं है किंतु 'दो के अङ्क से पहले का सा खेल न हुआ' (अर्थात् हार हुई) यही है. ऐसे एकपरि (या एक-पर), द्विपारि (या द्वापरि, या द्वापर) या त्रिकरि शब्द ही हारने के सूचक हैं क्योंकि चार (कृत) में तो जीत ही होती थी. काशिका ने 'पंचिका' नामक पांच पासों के खेल का उल्लेख करके लिखा है कि उसमें अधिक से अधिक (परंपरेण) चतुष्परि शब्द [इस अर्थ में] बन सकता है, क्योंकि पांच में तो जय ही होता है.

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