भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.185
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.185
- Language
- Hindi
c7.185
१ 'पॅपायरस' बरू (सरकंडा) की जाति के एक पौधे का नाम है, जिसकी खेती मिसर में नाइल नदी के मुहानों के बीच के दलदल वाले प्रदेश में बहुत प्राचीन काल से होती थी. यह पौधा चार हाथ ऊंचा और इसका डंठल तिधारा या त्रिकोण आकृति का होता था, जिसमें से ४½ इंच से ६½ इंच तक की लंबाई के टुकड़े काटे जाते थे. उनकी छाल (न कि गूदे से, देखो एं. सा. ब्रि. जिल्द ३३, पृ. ८६१) से बहुत कम चौड़ाई की चिंधियां निकलती थीं. उनको लेई आदि से एक दूसरी से चिपका कर पन्ना बनाया जाता था. ये पन्ने पहिले दबाये जाते थे फिर उनको सुखाते थे. जब वे बिलकुल सूख जाते तब हाथीदांत या शंख से घोट कर उनको चिकना और समान बनाते थे, तभी वे लिखने योग्य होते थे. इस प्रकार तय्यार किये हुए पन्नों को यूरोपवाले 'पॅपायरस' कहते हैं. उन्हीं पर पुस्तकें, चिट्ठियां तथा आवश्यकीय तहरीरें आदि लिखी जाती थीं, क्योंकि उस समय कागज़ का काम ये ही देते थे. इस प्रकार तय्यार किये हुए कई पन्नों को एक दूसरे के साथ चिपका कर उनके लंबे लंबे खरड़े भी बनाये जाते थे, जो मिसर की प्राचीन कब्रों में से मिल आते हैं. वे या तो लकड़ी की संदूकों में यत्नपूर्वक रक्खी हुई लाशों के हाथों में रक्खे हुए या उनके शरीर पर लपेटे हुए मिलते हैं. मिसर में ई. स. पूर्व २००० के आस पास तक के ऐसे खरड़े (पॅपायरस) मिले हैं, क्योंकि वहां वर्षा का प्रायः अभाव होने से ऐसी वस्तु अधिक काल तक नष्ट नहीं होती. लिखने की कुदरती सामग्री सुलभ न होने से ही बड़े परिश्रम से उक्त पौधे की छाल की चिंधियों को चिपका चिपका कर पन्ने बनाते थे तिस पर भी उसकी खेती राज्य के हाथ में रहती थी. यूरोप में भी प्राचीन काल में लेखनसामग्री का अभाव होने से चमड़े को साफ कर उसपर भी लिखते थे. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में ग्रीक लोगों ने मिसर से बने बनाये 'पॅपायरस' अपने यहां मंगवाना शुरू किया. फिर यूरोप में उनका व्यवहार होने लगा और अरबों के राजत्वकाल में इटली आदि में वह पौधा भी बोया जाने लगा, जिससे यूरोप में भी 'पॅपायरस' तय्यार होने लगे. ई. स. ७०४ में अरबों ने समरकंद नगर विजय किया जहां पर उन्होंने पहिले पहिल रूई और चीथड़ों से कागज़ बनाना सीखा, फिर दमास्कस (दमिशक) में भी कागज़ बनने लगे. ई. स. की नवीं शताब्दी में अरबी पुस्तकें प्रथम ही प्रथम कागज़ों पर लिखी गईं और १२ वीं शताब्दी के आस पास अरबों द्वारा कागज़ों का प्रवेश यूरोप में हुआ. फिर 'पॅपायरस' का बनना बंद होकर यूरोप में १३ वीं शताब्दी से कागज़ ही लिखने की मुख्य सामग्री हुई.