भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.137
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.137
- Language
- Hindi
c8.137
६ बूलर ने लिखा है कि 'अशोक के लेखों में दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखने के चिह्न बहुत कम मिलते हैं. जोगड और धौली के लेखों में 'ओ' उलटा है; और जौगड तथा देहली के सिवालिक स्तंभ के लेख में 'ध' कचित् उलटा मिलता है' (बू; इं. पे; पृ. ६), परंतु ये तो मामूली लेखकों के हस्तदोष या देशभेद के तुच्छ अंतर हैं. क्योंकि 'ओ' की आकृति, एक खड़ी लकीर के ऊपर के छोर से बाईं ओर को और नीचे के छोर से दाहिनी ओर को एक एक आड़ी लकीर खींचने से, बनती है. यह संभव है कि असावधान लेखक पहिले खड़ी लकीर खींच कर आड़ी लकीरें खींचने में गलती कर जावे. 'ध' की आकृति धनुष के सदृश होने के कारण उसकी प्रत्यंचा चाहे दाहिनी तरफ़ रहे या बाईं तरफ़ इसमें मामूली अनपढ़ लेखक शायद ही फ़र्क़ माने. देशभेद से भी कभी कभी किसी अक्षर की आकृति उलटी लिखी मिलती है जैसे कि ई. स. की छठी शताब्दी के यशोधर्मन् के लेख में 'उ' नागरी के 'उ' का सा है (देखो लिपिपत्र १८ वां) परंतु उसी शताब्दी के गरुळक सिंहादित्य के दानपत्र में उससे उलटा है (लिपिपत्र ३८ वां). वर्तमान बंगला लिपि का 'स' उलट लिखा जाता है (लिपि पत्र ७८) परंतु पहिले ऐसा न था (लिपिपत्र ३२-३५).