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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.149

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.149

Language
Hindi

c8.149

८ ई. स. १८६५ में डॉन मार्टिनो डी. ज़िल्वा विक्रमसिंहे ने रॉयल एशिआटिक सोसाइटी के जर्नल (त्रैमासिक पत्रिका) में एक पत्र प्रकाशित कर यह बतलाना चाहा था कि ‘सीलोन में कई शिलालेख प्राचीन ब्राह्मी लिपि के मिले हैं, जिनमें से दो में अक्षर उलटे हैं, परंतु उनकी छापों के अभाव में उनका विवेचन नहीं किया जा सकता’ (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५, पृ. ८६५-६८) और ई. स. १६०१ में एक लेख उसी जर्नल में फिर छपवाया जिसमें उलटा खुदा हुआ कोई शिलालेख तो प्रकाशित न किया किंतु उनकी छापें शीघ्र प्राप्त करने का यत्न करने की इच्छा प्रकट की, और अशोक के गिरनार के लेख में ‘प्र’ के स्थान में ‘पे’ ‘त्र’ के स्थान में ‘र्त’ आदि जो अशुद्धियां मिलती हैं उनपर से यह सिद्धांत निकाला कि ‘ब्राह्मी लिपि का रुख बदलने से ये अक्षर इस तरह लिखे गये’ (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६०१, पृ. ३०१-५); परंतु गिरनार के सारे लेख को ध्यानपूर्वक पढ़नेवाले को यह अवश्य मालूम हो जायगा कि उसके लिखनेवाले को संयुक्ताक्षरों का ठीक ठीक ज्ञान न था और संयुक्ताक्षर में प्रथम आने वाले ‘र्’ (रेफ) तथा द्वितीय आने वाले ‘र’ का अन्तर तो वह समझता ही न था जिससे उसने संयुक्ताक्षरों में ऐसी ऐसी अनेक अशुद्धियां की हैं. यदि इन अशुद्धियों पर से ही यह सिद्धांत स्थिर किया जा सकता हो कि ये ब्राह्मी लिपि के उलटे लिखे जाने के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं तो बात दूसरी है. ई. स. १६०३ में डॉ. राइस डेविड्स ने विक्रमसिंहे के ऊपर लिखे हुए पत्र और लेख के हवाले से मान लिया कि ब्राह्मी लिपि उलटी भी लिखी जाती थी (डे; बु. इं; पृ. ११४), परंतु साथ में यह भी लिख दिया कि ‘अब तक उलटी लिपि का कोई शिलालेख प्रसिद्ध नहीं हुआ.’