भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.5
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.5
- Language
- Hindi
c8.5
४ ई. स. ६७ में काश्यप मातंग चीन के बादशाह मिंग-टी के निमंत्रण से वहां गया, और उसके पीछे मध्यभारत का श्रमण गोभरण भी वहां पहुंचा. इन दोनों ने मिलकर एक सूत्रग्रंथ का अनुवाद किया और काश्यप के मरने के बाद गोभरण ने ई. स. ६८ और ७० के बीच ५ सूत्रों के अनुवाद किये. मध्यभारत के श्रमण धर्मकाल ने चीन में रह कर ई. स. २५० में ‘पातिमोक्ख’ का; धर्मप्रिय ने ई. स. ३८२ में ‘दशसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ का; कुमारजीव ने ई. स. ४०२ और ४१२ के बीच ‘सुखावतीव्यूह’ (छोटा), ‘वज्रच्छेदिका’ आदि कई ग्रंथों का; श्रमण पुण्यत्रत और कुमारजीव ने मिलकर ई. स. ४०४ में ‘सर्वास्तिवादविनय’ का; मध्यभारत के श्रमण धर्मजातयशस् ने ई. स. ४८१ में ‘अमृताथसूत्र’ का; बुद्धशांत ने ई. स. ५२४ और ५३६ के बीच १० ग्रंथों का और प्रभाकरमित्र ने ई. स. ६२७ और ६३३ के बीच ३ ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया. मध्यभारत का श्रमण पुण्योपाय (नाथी या नदी?) ई. स. ६५५ में बौद्धों के दोनों संप्रदायों (महायान और हीनयान) के त्रिपिटक से संबंध रखने वाले १५०० से अधिक पुस्तक, जो उसने हिन्दुस्तान और सीलोन (सिंहलद्वीप, लंका) में संग्रह किये थे, लेकर चीन में गया. दक्षिण का श्रमण वज्रबोधि और उसका शिष्य अमोघबज्र ई. स. ७१९ में चीन में गये. वज्रबोधी ने ई. स. ७२३ और ७३० के बीच ४ ग्रंथों का अनुवाद किया और वह ई. स. ७३२ में ७० वर्ष की अवस्था में मरा, जिसके बाद अमोघबज्र ने ई. स. ७४१ में हिन्दुस्तान और सीलोन की यात्रा की. ई. स. ७४६ में वह फिर चीन में पहुंचा और उक्त सन् से लगा कर उसकी मृत्यु तक, जो ई. स. ७७४ में हुई, उसने ७७ ग्रंथों के चीनी अनुवाद किये.
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