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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c8.6

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c8.6

Language
Hindi

c8.6

भी बौद्ध धर्म के तत्वों को जानने के लिये संस्कृत और प्राकृत का पठन पाठन होने लगा और वहां के बहुतेरे विद्वानों ने समय समय पर अपनी भाषा में बौद्ध धर्म के संबंध में अनेक ग्रंथ रचे जिनमें हमारे यहां की कई प्राचीन बातों का पता लगता है. ई. स. ६६८ में बौद्ध विश्वकोष ‘फा युअन चु लिन’ बना, जिसमें ‘ललितविस्तर’ के अनुसार ६४ लिपियों के नाम दिये हैं, जिनमें पहिला ब्राह्मी और दूसरा खरोष्ठी (किय-लु-से-टो=क-लु-से-टो=ख-रो-स-ट=खरोष्ठ) है और ‘खरोष्ठ’ के विवरण में लिखा है कि चीनी भाषा में इस शब्द का अर्थ ‘गधे का होठ’ होता है१. उसी पुस्तक में भिन्न भिन्न लिपियों के वर्णन में लिखा है कि ‘लिखने की कला का शोध तीन दैवी शक्ति वाले आचार्यों ने किया, उनमें से सब से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि (ब्राह्मी) बाईं ओर से दाहिनी ओर पढ़ी जाती है. उसके बाद किय-लु (किय-लु-से-टो=खरोष्ठ का संक्षिप्त रूप) है, जिसकी ‘लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर पढ़ी जाती है और सब से कम महत्व का त्सं-की है, जिसकी लिपि (चीनी) ऊपर से नीचे की तरफ़ पढ़ी जाती है. ब्रह्मा और खरोष्ठ भारतवर्ष में हुए और त्सं-की चीन में. ब्रह्मा और खरोष्ठ ने अपनी लिपियां देवलोक से पाईं और त्सं-की ने अपनी लिपि पक्षी आदि के पैरों के चिन्हों पर से बनाईं.’२