Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.7
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.7
- Language
- Hindi
c11.7
भारतवर्ष के इतिहास के ये तीन सौ बरस न तो केवल लड़ाई भिड़ाई में ही बीते और न तो, जैसा कुछ इतिहासकारों का विश्वास है इसके पिछले युग का इतिहास (ई० स०१५६ से ३५० तक) अन्धकार मय ही है क्योंकि इस काल के इतिहास पर डा० जायसवाल प्रभृति विद्वानों ने अच्छा प्रकाश डाला है । प्लिनी और पेरिप्लस के ग्रंथों से, तथा बृहत्तर भारत और इस देश के पुरातत्व संबंधी अन्वेषणों से यह पता चलता है कि इस युग में कला और साहित्य समुन्नत थे। भारत और रोम के साथ हमारा गहरा व्यापारिक संबंध था और हम अपनी ब्रह्मविजय से मध्य एशिया से लेकर हिंदचीन तक अपनी सांस्कृतिक धाक जमा चुके थे। ई० सन् की पहिली शताब्दी में हिन्द-चीन, अनाम कंबुज तथा यवद्वीप इत्यादि में भारतीय राज्य बन चुके थे। भारतीयों का पूर्व की ओर प्रसार उन्हें चीनियों के संयोग में लाया और इन दोनों देशों में व्यापारिक संबंध बढ़ा। इसी युग में रोम साम्राज्य के उत्कर्षावस्था में भूमध्य सागर और भारत का मूल्यवान व्यापारिक संबंध और भी दृढ़ हुआ। भारतीय रत्न, मसाले, गंधद्रव्य और कीमती 'मिरहिना' की घरियां, जिनकी कीमत से घबराकर प्लिनी को रोमनों के भाग्य पर रोना पड़ा, तथा बढ़िया मलमल इस देश से रोम को जाते थे । सज्जा की इन वस्तुओं के व्यापार से देश की आमदनी इतनी बड़ी कि व्यापार का पलड़ा हमारी ओर झुक गया और इसके फलस्वरूप बहुत बड़े पैमाने में रोमन दीनारें इस देश में आने लगी ।