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Pracin Bharatiya Veshabhusha c11: सातवाँ अध्याय : ईस्वी पहली शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी के आरंभ तक के साहित्य में वर्णित वेश-भूषा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11

Language
Hindi

Contents

सातवाँ अध्याय : ईस्वी पहली शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी के आरंभ तक के साहित्य में वर्णित वेश-भूषा

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ईस्वी पहली शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी के आरंभ तक के साहित्य में वर्णित वेश-भूषा

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भारतीय इतिहास की मुख्य घटनाओं में ईस्वी प्रथम शताब्दी में इस देश में कुषाणों का आगमन है। कुषाण ऋषिक (यू० ची०) कबीले के एक अंग थे और उनका आदिम निवासस्थान चीन के उत्तर पश्चिमी भाग में था। हूणों द्वारा ई० पू० १६५ में विजित होकर ऋषिकों ने पहले तो शकों के देश पर कब्जा किया और बाद में आगे बढ़ते हुए करीब ई० पू० १० वीं सदी में उन्होंने बलख जीत लिया। कुषाण वंश के सब से प्रसिद्ध राजा कनिष्क ने पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) को अपनी राजधानी बनाया। कनिष्क विद्वानों का आदर करते थे और इनकी सभा में संस्कृत के प्रसिद्ध कवि अश्वघोष और प्रसिद्ध वैद्य चरक थे। कनिष्क बौद्ध थे इसलिए धर्मप्रसार के लिए इन्होंने तिब्बत, मंगोलिया और खोतान ऐसे सुदूर देशों में भिक्षु भेजे । संस्कृत बौद्ध साहित्य तथा तत्कालीन लेखों से पता चलता है कि सर्वहित कामना का इस युग में विशेष प्रचार था ।

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उत्तर भारत में कुषाणों के उदय होते ही सातवाहनों की सत्ता को धक्का पहुंचा और उनकी राज्य-सीमा घटकर केवल दक्खन तक ही रह गयी। करीब ११० ई० से० के चष्टन कुषाणों के महाक्षत्रप हुए लेकिन बाद में सातवाहनों ने उनसे यह सत्ता छीन ली। चष्टन के पोते रुद्रसिंह, जिन्होंने अपनी कन्या का विवाह राजा सातवाहन के पुत्र से किया था, अपने संबंधी को युद्ध में दो बार हराकर धीरे धीरे सिंध, मारवाड़, कच्छ, सुराष्ट्र, गुजरात, मालवा और उत्तरी महाराष्ट्र पर कब्जा कर लिया । बाद में सातवाहन अपने विजित राष्ट्र के कुछ भाग ले लेने में समर्थ हुए ।

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ईसा की आरंभिक सदियों में तामिल देश पर चेर, चोल और पांड्यों की सत्ता थी और इनमें बहुधा लड़ाइयां भी होती रहती थीं । तमिलनाड का सब से प्रतापी राजा करिकाल चोल ने (करीब ई० ७०-१०० तक), जिसने सिंहल के सम्राट् गजबाहु को हराया, उरैयूर (आधुनिक त्रिचनापल्ली) में अपनी राजधानी कायम की। इस युग में कावेरी के मुहाने पर कावेरीपट्टन प्रसिद्ध बंदरगाह बन गया। चेर सॅगुट्टुवन् (करीब ई० १४०-१९२) दक्षिण देश का एक दूसरा बड़ा राजा था जिसने चोल देश के नौ सम्मिलित राज्यों को हराया। इसकी यश-गाथा हमें प्रसिद्ध तमिल काव्य सिलप्पदिकारं में मिलती है।

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ईस्वी दूसरी शताब्दी के अंत में सातवाहन साम्राज्य छिन्न भिन्न होने लगा। आभीरों ने गुजरात में एक स्वतंत्र राज्य कायम किया । चुटु सातवाहन करीब सौ साल तक

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अपनी राजधानी वैजयन्ती (आधुनिक बनवासी, कनारा) से उत्तर महाराष्ट्र और कर्नाटक पर राज्य करते रहे और इक्ष्वाकुवंश अपनी राजधानी शायद नागार्जुनीकोंड (धान्यकटक, गुंटूर जिला) से आंध्र देश पर। उत्तर भारत में नाग, भारशिव, और मघराजाओं ने कुषाणों को निकाल बाहर किया और यौधेयों और मालवों के गणतंत्र प्रबल हो उठे । बाद में भारशिवों की सत्ता के अंत होने पर विंध्यशक्ति ने ई० २४८-२८४ में प्रसिद्ध वाकाटक वंश की स्थापना की और उस वंश का सबसे प्रतापी राजा प्रवरसेन (ई० स० २८४-३४४) हुआ।

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भारतवर्ष के इतिहास के ये तीन सौ बरस न तो केवल लड़ाई भिड़ाई में ही बीते और न तो, जैसा कुछ इतिहासकारों का विश्वास है इसके पिछले युग का इतिहास (ई० स०१५६ से ३५० तक) अन्धकार मय ही है क्योंकि इस काल के इतिहास पर डा० जायसवाल प्रभृति विद्वानों ने अच्छा प्रकाश डाला है । प्लिनी और पेरिप्लस के ग्रंथों से, तथा बृहत्तर भारत और इस देश के पुरातत्व संबंधी अन्वेषणों से यह पता चलता है कि इस युग में कला और साहित्य समुन्नत थे। भारत और रोम के साथ हमारा गहरा व्यापारिक संबंध था और हम अपनी ब्रह्मविजय से मध्य एशिया से लेकर हिंदचीन तक अपनी सांस्कृतिक धाक जमा चुके थे। ई० सन् की पहिली शताब्दी में हिन्द-चीन, अनाम कंबुज तथा यवद्वीप इत्यादि में भारतीय राज्य बन चुके थे। भारतीयों का पूर्व की ओर प्रसार उन्हें चीनियों के संयोग में लाया और इन दोनों देशों में व्यापारिक संबंध बढ़ा। इसी युग में रोम साम्राज्य के उत्कर्षावस्था में भूमध्य सागर और भारत का मूल्यवान व्यापारिक संबंध और भी दृढ़ हुआ। भारतीय रत्न, मसाले, गंधद्रव्य और कीमती 'मिरहिना' की घरियां, जिनकी कीमत से घबराकर प्लिनी को रोमनों के भाग्य पर रोना पड़ा, तथा बढ़िया मलमल इस देश से रोम को जाते थे । सज्जा की इन वस्तुओं के व्यापार से देश की आमदनी इतनी बड़ी कि व्यापार का पलड़ा हमारी ओर झुक गया और इसके फलस्वरूप बहुत बड़े पैमाने में रोमन दीनारें इस देश में आने लगी ।

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भारतीय वेश-भूषा की प्रचुर सामग्री हमें इस युग की मूर्तियों और अर्धचित्रों में मिलती है। उत्तर पश्चिमी सीमाप्रान्त की गंधार-मूर्तियां, मथुरा की कुषाण मूर्तियां तथा अमरावती, नागार्जुनीकुंड और गोल्ली से मिले अर्धचित्र हमें यह बतलाते हैं कि धोती, साड़ी तथा पगड़ी पहनने में कौन कौन सी स्थानिक विशेषताएं थीं। उत्तर पश्चिमी भारत में शुद्ध भारतीय वेश-भूषा के सिवाय कंचुक, शलवार, टोपियां इत्यादि विदेशी वस्त्र भी काम में लाये जाते थे । ये वस्त्र प्राचीनभारत और मध्य एशिया तथा ईरान के सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध के प्रतीक हैं । गंधार की कला यूनानी कला से प्रभावित थी जिसके फल-स्वरूप हम गंधार की कला में स्त्री-पुरुषों को कभी कभी यूनानी कपड़े पहने देखते हैं। कुषाण सिक्कों पर अंकित कुषाण राजाओं की आकृतियों से हमें शकों की वेश-भूषा का अच्छा पता लगता है। दक्षिण भारत में स्त्रियों और पुरुषों की वेश-भूषा बहुत सादी होती थी।

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वे केवल मलमली धोती और कमरबंद पहनते थे कंचुक तो केवल योद्धागण, शिकारी और द्वारपाल ही पहनते थे । इस युग के अर्धचित्रों में पंजाबियों की प्रिय कुलाह भी कभी कभी दिखलायी पड़ती है ।

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कुषाण युग के साहित्य से उस युग की वेश-भूषा पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता। महावग्ग और चुल्लवग्ग ऐसे ग्रंथों का जिनमें ईसा के पूर्व चौथी या पांचवी शताब्दी के नर-नारियों की वेश-भूषा, पहनने के ढंग और कपड़ों का विशद वर्णन है, इस युग में अभाव ही सा है। इस युग के साहित्य में वेश-भूषा का छिटपुट वर्णन है, और वस्त्रों और कपड़ों का नाम बिना किसी भाष्य के आते हैं। इन शब्दों के अर्थ आधुनिक कोशों में भी नहीं मिलते और अगर मिलते भी हैं तो यह पता नहीं चलता कि वे वस्त्र सूती, रेशमी अथवा और किसी दूसरे रेशों से बनते थे । इस युग के कपड़ों का ज्ञान हमें "पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रियन सी" नामक एक पुस्तक से, जिसे एक यूनानी नाविक ने ईसा की पहली शताब्दी में भूमध्य और हिंद-सागर के व्यापारिक संबंध पर लिखा था, मिलता है ।

कपास धुनने, कातने और बुनने की क्रिया

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इस युग में सूती कपड़े का बहुत चलन हो गया था। अच्छी कपास पैदा की जाती थी और कपास के खेत (कपासवाट) का उल्लेख मिलता है१। कपास की मृदुता (कर्पास-पिलु) के लोग कायल थे। दिव्यावदान में एक जगह२ उपगुप्त के शरीर की कोमलता की उपमा कर्पास से दी गयी है। कपास बाजार से खरीद कर धुन ली जाती थी (तं परिकर्मयित्वा, और उससे पतला एकसां सूत कात लिया जाता था३। बुनकर (कुविंद), कपड़े बीनते समय चीर छोड़कर (अविचीरविचीरकं) तथा अपने सिर उठाकर और अपने हाथ पैरों का संचालन करते हुए बुनना आरंभ करते थे । पास में बैठी बुनकर की स्त्री माड़ी (दिव्यसुधा) देकर ताना तानने का काम आरंभ कर देती थी (तसरिकां कर्तुमारब्धा)४। दो हजार वर्षों के बाद भी आज हम एक बुनकर के घर यही दृश्य देख सकते हैं। कार्पासिकों और बुनकरों (तंत्रवायका) का अपनी श्रेणियां होती थीं (महावस्तु, आ० ३, पृ० ११३)

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१ दिव्यावदान, पृष्ठ २१२, सतर २१

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२ वही, पृ० ३८८, सतरें १४-१५ तथा पृ० २१०, १४

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३ वही, पृ० २७६, स० ६, ११

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४ वही, पृ० ८३, स० २१-२५

कलिंग देश के नाग बुनकर

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दक्षिण भारत में इस युग में नाग जाति बहुत सी कलाओं में और विशेषकर बुनाई में पारंगत थी। कलिंग देश के नाग बुनाई में इतने कुशल होते थे कि तामिल भाषा में कलिंग शब्द अच्छे कपड़े का बोधक हो गया । ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में पूर्व समुद्र के किनारे पांड्यों की राज्य-सीमा में भी बहुत अच्छे बुनकर थे और इनकी बनायी हुई मलमल काफी

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परिमाण में निर्यात होती थी । बढ़िया मलमल की तामिल काफी कदर करते थे और बाहरी देशों में भी इसका बड़ा गहरा दाम मिलता था ५ एक प्राचीन तामिल काव्य में अय नाम के एक प्रसिद्ध राजा के नील नाग द्वारा भेंट किया हुआ एक अमूल्य मलमल का थान शिव की मूर्ति पर चढ़ाने का उल्लेख है६ । मूल सर्वास्तिवादियों के विनय में एक जगह स्त्रीरत्न के शरीर के मृदुता की उपमा कलिंग प्रावार से दी गयी है (गिलगिट टेक्स्ट्स्, भा० ३, २, पृ० ३६)

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५ कनकस्सभै, दि तामिल्स एट्टीन हंड्रेड इयर्स एगो, पृ० ४५

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६ शॉफ, दि पेरिप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी, पृ० ७२-७३, १७६-१८०

रोम में भारतीय मलमल

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भारतीय मलमल की रोम साम्राज्य में बड़ी कीमत होती थी पेरिप्लस के अनुसार सबसे अच्छी मलमल को 'मोनाचे' और कुछ घटिया रुई के बने कपड़े को जिसका व्यवहार खोल बनाने के लिए होता था 'सगमतोगेने' कहा जाता था । ये कपड़े गुजरात में बनते थे और भड़ोच से एक घटिया बैंगनी रंग के 'मोलोचीन' नामक कपड़े के साथ पूर्वी अफ्रीका के बंदरों में भेजे जाते थे७ । इसी तरह के कपड़े भड़ोच होकर अरब, मिस्र और सोकोतरा भी भेजे जाते थे । भड़ोच की बंदरगाह में ये कपड़े उज्जैन और तगर (आधुनिक तेर) से आते थे८ । त्रिचनापल्ली और तंजोर में आर्गारितिक९ नाम की मलमल बनती थी जिसका यूनानी नाम चोलों की राजधानी उरैयूर (आधुनिक त्रिचनापल्ली का एक भाग) में बनने से पड़ा । मसालिया (आधुनिक मसुलीपतन) में भी काफी मलमल बनती थी१० । पर सब से अच्छी मलमल का नाम 'गेंजेटिक' था और वह शाफ के अनुसार ढाका के आस-पास बनती थी११ । काशी भी उस युग में कीमती मलमल बनाने का एक बड़ा केन्द्र था और हो सकता है कि गेंजेटिक से यहां काशी की मलमल का उद्देश्य रहा हो । रोम में भारत के सादे और रंगीन वस्त्रों की इतनी अधिक मांग थी कि दूसरे देशों के कपड़ों की मांग काफी गिर गयी । इस देश की सब से अच्छी मलमल का नाम रोमनों ने 'वेंटस टेक्सटाइलिस' (हवा की तरह कपड़े) और 'नेबुला' रक्खा । एरियन के अनुसार भारत में बने सूती कपड़े दूसरे देशों में बने कपड़ों से अधिक सफेद और चमकीले होते थे तथा लूशियन के अनुसार भारतीय कपड़े यूनानी कपड़ों से भी हलके और मुलायम होते थे१२ । संस्कृत बौद्धसाहित्य में मलमल के लिए विरली शब्द आया है । बिंदुसार द्वारा एक कीमती विरली अंबपाली को भेंट दी गयी (वही, ३, २, पृ० २०) जामदानी के काम को चित्रा विरली कहते थे (वही, पृ० २३)

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८ वही, पृ० ४२

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९ वही, पृ० ४६

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१० वही, पृ० ४१

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११ वही, पृ० ४७

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१२ वामिंगटन, कामर्स बिटवीन दी रोमन एम्पायर एंड इंडिया, पृ० २१२

रेशमी वस्त्र

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रेशमी कपड़ों की काफी चलन थी और इस देश में काफी रेशमी कपड़े बनते भी थे। दिव्यावदान१३ में रेशमी वस्त्र के लिए पट्टांशुक, चीन, कौशेय और धौतपट्ट शब्दों का व्यवहार हुआ है। लेकिन इन रेशमी वस्त्रों में बनावट और नक्काशियों की दृष्टिकोण से क्या फरक था इसका पता हमें नहीं लगता। लगता है पट्टांशुक सफेद और सादा रेशमी वस्त्र था; चीन चीन देश में बने रेशमी कपड़े को कहते थे; कौशेय शहतूत की पत्ती खाकर कोश बनाने वाले कीड़ों के रेशम से बने वस्त्र का नाम था और धौतपट्ट खारे हुए रेशम के बने वस्त्र को कहते थे। नकाशीदार रेशमी वस्त्र को कोशिकारफ भी कहते थे (महावस्तु, १, पृ० २३५-२३६)। विचित्रपटोलक१४ अथवा नक्काशीदार रेशमी वस्त्र का भी उल्लेख है। इस वस्त्र का नाम गुजरात की पटोला साड़ी में जिसे विवाह के अवसर पर लड़की का मामा उसे भेंट में देता है बच गया है। यह साड़ी बांधणी रंगने की विधि से रंगे हुए तानेबाने से बनती है। इसकी बिनावट में सकरपारे पड़ते हैं जिनके बीच में तिपतिये फूल होते हैं। कभी कभी अलंकारों में हाथियों की पंक्ति, पेड़, पौधे, मनुष्य-आकृतियां और चिड़ियां भी होती हैं१५। लेकिन ये अलंकार नये हैं पुराने अलंकारों का हमें पता नहीं है। पटोलक के साथ विचित्र विशेषण से पता लगता है कि वह रंग-बिरंगा कपड़ा होता था।

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१३ दिव्यावदान, पृ० ३१६

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१४ ललितविस्तर, पृ० ११३, सतर १, डा० राजेंद्र लाल मित्र संपादित, कलकत्ता १८७७

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१५ वाट, इंडियन आर्ट एट दी देहली एक्जिविशन, पृ० २५६-२५६

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तमिलनाड में धनिक वर्ग रेशमी कपड़े पहनता था। सिलप्पदिकारं में एक जगह कहा गया है कि मदुरा की स्त्रियां पुष्पायलंकृत लाल रंग की रेशमी साड़ियां पहनती थीं१६।

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१६ सिलप्पदिकारं, १४, पृ० २०३

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पेरिप्लस में इस बात का उल्लेख है कि सिंध नदी पर बारबरिकोन बंदरगाह से रेशम का निर्यात होता था, और बल्ख के रास्ते सिंध होते हुए भड़ोच को, रेशम और कीमती रेशमी कपड़े भेजे जाते थे। रेशमी कपड़े मुजिरिस, नेल्किण्डा तथा मालाबार के और दूसरे बाजारों में गंगा के मुहाने और पूर्वी समुद्र के किनारे से होकर पहुंचते थे१७। ईसा की आरंभिक सदियों में चीन से रेशमी वस्त्र ब्रम्हपुत्र की घाटी, असम और पूर्वी बंगाल भी हो कर आते थे१८। रेशमी कपड़ों के व्यापारी चोलों की राजधानी कावेरीपट्टन में भी पहुंचा करते थे१९। 'पेरिप्लस' के अनुसार रोमन व्यापारियों के रेशमी वस्त्र गंगा के मुहाने, खंभात की खाड़ी और त्रावंकोर के बंदरों में मिलते थे जहां इनका आयात पश्चिमी चीन के व्यापा- स्त्रियों द्वारा होता था२०। चीनपट्ट के सिवाय भारतवर्ष के बने रेशमी कपड़े भी शायद ईसा की आरंभिक शताब्दियों में रोम पहुंच चुके थे।

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१७ वामिंगटन, वही, पृ० १७६; शॉफ, वही, पृ० २६३-२६८

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१८ वाट, डिक्सनरी आफ एकोनामिक प्राडक्टस आफ इंडिया, पृ० ६६८-१०२६

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१९ वामिंगटन, वही, पृ० १७६

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२० शॉफ, वही, पृ० १७२

ऊनी कपड़े और पश्मीना

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ऊनी कपड़े का साधारण बोधक शब्द कंबल था२१। इस युग में ऊनी कपड़ों के लिए शायद दूष्य (आधुनिक धुस्सा) शब्द का भी व्यवहार होता था२२। दिव्यावदान में कहा गया है कि उत्तर कुरु देश में कल्पदूष्य नामक वृक्ष से तुंडिचेल नाम के कपड़ों के थान पैदा होते थे, जिनसे नीले, पीले, लाल और सफेद रंग के कल्पदूष्य के छोटे बड़े टुकड़े बनते थे२३। यह भी कहा गया है कि मातंग स्त्रियां बिना कुंदी किया हुआ दूष्य (अनाहत दूष्य) पहनती थीं२४। कभी कभी ऊन और दुकूल के रेशों को मिलाकर बहुत अच्छे कपड़े बिने जाते थे (ऊर्णा दुकूलमयशोभनवस्त्राणि)२५। एशिया के ऊनों में कश्मीर, भूटान, तिब्बत और उत्तरी हिमालय में बकरों के रोयें का ऊन जिसे पश्म कहते हैं अपने चिकने पोत के लिए प्रसिद्ध है। रोम के बादशाह ऑरेलियन को ईरान के बादशाह द्वारा एक लाल रंग के पश्मीने के रुमाल के भेजने का उल्लेख है। वामिंगटन का कहना है कि यह रुमाल भारतवर्ष का बना था२६। रोमन कानून के संग्रह (३९।५।७) में मारोकोकोरम लाना भारत के उत्तरी-पश्चिमी बंदरगाहों से लाया गया पश्म था जो मिस्र देश में बुना जाता था। वामिंगटन का अनुमान है२७ कि मारोकोकोरम शब्द शायद काराकोरम का अपभ्रंश है। इसमें संदेह नहीं कि आज दिन भी सब से अच्छा पश्म पामीर से आता है। रंगीन पश्म भारत से बाहर नहीं जाता था और इसलिए अर्रेलियन और उसके परवर्ती राजाओं को लाल पश्मीना देखकर विस्मय होता था२८। प्राचीन काल में पश्म का बहुत दाम होता था। इस बात का उल्लेख है कि ससानी बादशाह हुरमुज द्वितीय (ई० ३०२-३१०) ने काबुल के राजा की कन्या से जब विवाह किया तब उसके दहेज में काश्मीर के अच्छे से अच्छे पश्मीने के बने शाल दुशाले आये, जिनकी कारीगरी देखकर सब लोग चकित हो गये२९।

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२१ दिव्यावदान, पृ० ३१६, सतरें—२३-२७

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२२ वही, पृ० २१५, स० २७-२६

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२३ वही, पृ० २२१, स० १७-२०

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२४ वही, पृ० ६१४, स० १७

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२५ वही, पृ० ३१६, स० २३-२७

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२६ वामिंगटन, वही, पृ० १६०

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२७ वही, पृ० १६०

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२८ वही, पृ० १६१

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२९ वही, पृ० १६१

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संस्कृत बौद्ध साहित्य में भी ऊनी वस्त्रों के कई जगह उल्लेख हैं । ऊनी वस्त्र कभी कभी बहुत पतला होता था । कंबल सूक्ष्मणि (महावस्तु, २, पृ० ११६) तथा ऊन बिनने वालों (ऊर्णवायक) की अपनी श्रेणी होती थी (वही, ३, पृ० ११३) । साधारण और ऊंट के बाल के बने कंबलों का (कुतुप, उष्ट्रकंबल) का भी व्यापार होता था (गिलगिट टेक्स्ट, ३, २, पृ० ९५-९६)

क्षौम, शाण, पांडुदुकूल, हर्यणी, अपरांतक, फलक, फुट्टक और पुष्पपट्ट

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क्षौम—क्षौम अथवा तीसी के छाल के रेशों से बने कपड़ों का काफी व्यवहार होता था ।३०

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३० दिव्यावदान पृ० ३१६, पं० २३-२७ ; पृ० ५७७, पं० २१-२२

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शण—अठ्ठारह गज लंबे और बारह गज चार अंगुल चौड़े सन के बने कपड़े का उल्लेख है ।३१ एक दूसरी जगह सन की साड़ी (शण शाटिका) बिने जाने का उल्लेख है । ऐसा पता चलता है सन की बनी धोती (शण शाटिका) गरीब किसान पहनते थे ।३३

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३१ वही, पृ० ३४६, पं० ३-५

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३३ वही, पृ० १६४, पं० ३

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हिरि वस्त्र—सुनहले कपड़े को हर्यणी३४ अथवा हिरि वस्त्र३५ कहते थे । लगता है कि इन शब्दों से आधुनिक किमखाब की तरह किसी वस्त्र की ओर संकेत है । पर इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता कि आया यह कपड़ा सादा होता था या नक्काशीदार । सुनहले कलाबत्तू से बिनी गई और रत्नों से जटिल (रत्न-सुवर्ण-प्रावरकाः) कीमती चादरें भी होती थीं । ३६

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३४ वही, पृ० ३१६

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३५ ललितविस्तर, पृ० १५८, सं० १८

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३६ दिव्यावदान, पृ० ३१६

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पांडुदुकूल—दुकूल के रेशों से बना सफेद कपड़ा३७ । इस युग के साहित्य में दुकूल का ठीक ठीक परिचय नहीं मिलता । जैन अंगों की टीकाओं में गौड़ अथवा बंगाल की रूई को दुकूल कहा गया है पर यह व्याख्या बारहवीं शताब्दी की होने से अविश्वसनीय है । दुकूल शायद दुकूल वृक्ष की छाल के रेशों से बना कपड़ा था ।

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३७ ललितविस्तर, पृ० ३३३

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काशिक वस्त्र—बनारस में बने कपड़ों के लिए काशिक वस्त्र३८, काशी३९ तथा काशिकांसु४० इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ है। बहुधा काशिक वस्त्र से लोग रेशमी कपड़े

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३२ वही, पृ० ८३, पं० २१-२५

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३८ दिव्यावदान, पृ० ३६१, पं० ६

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३९ वही, पृ० ३८८, पं० १७

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४० वही, पृ० ३१६, पं० २३-२७

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का अनुमान करते हैं क्योंकि आज दिन भी बनारस रेशमी कपड़े बिनने का मुख्य केन्द्र है । लेकिन इस युग के साहित्य में काशी के बने वस्त्रों का रेशमी होने का कहीं उल्लेख नहीं है। बहुत संभव है कि ये वस्त्र सूती रहे हों क्योंकि प्राचीन काल में बनारस के आसपास बहुत अच्छी कपास पैदा होती थी और यहां की कत्तिनें बहुत महीन सूत कातती थीं। भैषज्यगुरु-सूत्र४१ में कहा गया है कि काशिक वस्त्र बहुत महीन होते थे (सूक्ष्माणि जालानि च संहिनानि)। काशिक वस्त्र से बहुत अच्छे पहनने के कपड़े बनने का भी उल्लेख है४२ ।

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४१ —गिलगिट टेक्स्ट्स, भा० १, पृ० १२५-१२६

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४२ —ललितविस्तर, पृ० २६२, पं० ६

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फलक—लगता है यह कपड़ा किसी फल के रेशे से बनता था४३।

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४३ —वही, पृ० १५८, पं० १८

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अपरांतक—शायद कोंकण में बना कपड़ा। यह पता नहीं चलता कि कपड़ा सूती होता था या रेशमी४४।

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४४ —दिव्यावदान, पृ० ३१६, पं० २३-२७

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फुट्टक—ठीक ठीक तो नहीं कहा जा सकता पर ऐसा अनुमान होता है कि शायद यह शब्द छींट अथवा चूंदरी के लिए आया है । इस कपड़े की काफी मांग थी । सोपारा में ऐसी दूकानें (फुट्टक वस्त्रााकारि) थीं जहां केवल यही कपड़ा बिकता था४५ ।

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४५ —वही, पृ० २४, पं० ७

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पुष्पपट्ट—फूलदार कपड़ा । यह ठीक पता नहीं चलता कि फूल बिने हुए, छपे हुए अथवा कसीदा किए होते थे४६ । सम्भव है जामदानी से तात्पर्य हो ।

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४६ —ललितविस्तर, पृ० १४१, पं० २०; पृ० ३६८, पं० १४

साधुओं के वस्त्र

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भिक्षुक, तथा ऋषि मुनि फलक, वल्कल, मूंज, दर्भ तथा वल्वज के बने कपड़े तथा ऊंट, बकरे तथा मनुष्य के बालों के बने कंबल पहनते थे४७ ।

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४७ —वही, पृ० ३१२, पंक्ति १-१३

चीनी और भारतीय कपड़े और समूर

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इस युग में साधुओं को छोड़ कर और कोई चमड़े के बने वस्त्र नहीं पहनता था। लेकिन इस युग में भारतवर्ष और रोम में चमड़े और समूरों का काफी व्यापार होता था। पेरिप्लस का कहना है कि चीनी चमड़े और समूरों का निर्यात सिंध नदी पर स्थित बार्ब-रिकोन४८ बंदरगाह से होता था । प्लिनी के अनुसार रोम में बराबर४९ चीनी लोहा, सूत और चमड़े आते थे ।

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४८ —शॉफ, वही, पृ० ३८

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४९ —प्लिनी, ३४, ४१

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वालदार खुरदरे चमड़े अथवा भारी ऊनी कोट उत्तर पश्चिमी भारत से पूर्वी अफ्रिका को भेजे जाते थे। कावेरी पट्टन में भी ऊनी कपड़े बिकते थे। लातीनी में इस तरह की वस्तुओं को सामूहिक रूप से ‘केपिली इंडिकी’५० कहते थे। जांच पड़ताल से पता लगता है कि प्लीनी कथित चीनी लोहा, सूत और चमड़े वास्तव में चीन की पैदावार नहीं थे ये सब वस्तुएं भारतवर्ष की थीं जो पेरिप्लस के अनुसार खंभात की खाड़ी से हो कर सुमाली समुद्र तट के बंदरगाहों को जाती थीं५१। वार्मिंगटन के अनुसार सिंध नदी के बार्बरिकन बंदरगाह से जिन समूरों का निर्यात होता था उसमें कुछ तो मध्य एशिया के कौशेय पथ के सार्थवाहों द्वारा चीनी रेशम के साथ बलख होते हुए सिंध की ओर आते थे और कुछ तिब्बती समूर होते थे५२।

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५० वार्मिंगटन, वही, पृ० १५७

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५१ शॉफ, वही, पृ० १७३

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५२ वार्मिंगटन, वही, पृ० १५८

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चीनी कपड़े मौर्य युग में चीनसि५३ नाम से विख्यात थे पर इस बात का अभी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है कि इतने प्राचीन काल में भी भारतवर्ष और चीन में भी व्यापारिक संबंध था। हो सकता है कि ईसवी पूर्व के भारतीय साहित्य में शायद चीन से काफिरिस्तान, कोहिस्तान और दरद प्रदेशों से मतलब है जहां “शिना” बोली जाती है। भारत में समूर के आयात का पता हमें महाभारत५४ से भी लगता है।

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५३ अर्थशास्त्र, पृ० ८१

c11.s8.14

५४ महाभारत, २, ५१, ८

कपड़े की दूकानें

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इस युग में तरह तरह के कपड़ों की दूकानें होती थीं। लेकिन उनमें कुछ ऐसी भी दूकानें होती थीं जिनमें केवल एक ही प्रकार का कपड़ा मिल सकता था। प्राचीन शूर्पारक (आधुनिक सुपारा) में कुछ ऐसी दूकानों का उल्लेख है जिनमें केवल काशी के वस्त्र (काशिक वस्त्रावारि५५) अथवा छपे हुए कपड़े (फुट्टक वस्त्रावारि) मिलते थे५६। मदुरा में बजाजा होने का भी उल्लेख है। यहां दूकानों में तरह तरह के कपड़े तथा ऊन और सूत की पेटियां जिनमें हर पेटी में सौ लच्छे होते थे५७ मिल सकती थीं। कावेरी पट्टन में ऐसे बुनकर (कारुक) होते थे जो अपने काम के साथ ही साथ रेशमी तथा सूती कपड़ों और समूरों की दलाली भी किया करते थे५८।

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५५ दिव्यावदान, पृ० २१, पंक्ति ४-५

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५६ वही, पृ० २६, पंक्ति १, ७

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५७ सिलप्पदिकारं, १४, पृ० २०८

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५८ वही, ५, पृ० ११०

साहित्य में भारतीय वेश-भूषा के उल्लेख

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उत्तर भारत की वेश-भूषा—इस युग के साहित्य में भारतीय पहरावे का कम उल्लेख हुआ है। साधारणतः लोग धोती और दुपट्टा पहनते थे। काशी के बने धोती, दुपट्टे सारे भारत में प्रसिद्ध थे५९। धोती दुपट्टे की जोड़ी (यमली) की कीमत कभी कभी एक लाख कार्षापण६० तक पहुंच जाती थी। राजे महाराजे कुंदी किए हुए चौड़े किनारे वाले नये वस्त्र पहनते थे। (आहतानि वासांसि नवानि दीर्घ दशादि) ये वस्त्र उनके शरीर को पूर्ण रूप से ढंक लेते थे६१। यहां चौड़े किनारे वाले कपड़ों से शायद धोती और दुपट्टे से मतलब हो। पूरे शरीर ढंकने वाले वस्त्रों से शायद कंचुक से मतलब हो। बुनकर६२ और किसान६३ सत्री धोती (शण शाटी) पहनते थे। छोटी धोती को प्रावरण पोत्री (गुजराती, पोत्यूं६४) कहते थे। राजे पगड़ी भी (प्रवर मौलि पट्ट) पहनते थे६५। राजा के सिवाय मंत्री कंचुकी सेठ और पुरोहित भी पगड़ियां पहनते थे६६।

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५९ दिव्यावदान, पृ० २६, पंक्ति ६

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६० वही, पृ० २३६, पंक्ति ६-११

c11.s10.4

६१ वही, पृ० ३६८, पंक्ति २७-२८

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६२ वही, पृ० ८३, पं० २१-२५

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६३ वही, पृ० ४६३, पं० ८

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६४ वही, पृ० २५६, पं० २६

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६५ वही, पृ० ४२०, पं० ५-७

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६६ भारतीय नाट्यशास्त्र, २३।१२६

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राजे कभी कभी सिले कपड़े जो शायद कंचुक रहे हों (चोडक-संघात-प्रत्यवरेण-वाससं) पहनते थे६७। राजमहल के अंगरक्षक और पहरुवे काषाय कंचुक पहनते थे६८। योद्धा भी कंचुक पहनते थे६९ और उनकी छाती और बांह जिरह बस्तर से ढंके रहते थे। (मणिवर्म पंचांगोपेतम्७०)। सुंदर रंगों से कपड़े रंगने की कला (वस्त्रराग७१) और सिलाई की कला७२ सीखना इस युग में शिक्षा का एक आवश्यक अंग माना जाता था।

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६७ दिव्यावदान, पृ० ४१५, पं० ५-७

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६८ भारतीय नाट्यशास्त्र, २३।१२६

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६९ ललितविस्तर, पृ० ४७, पं० ७

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७० दिव्यावदान, पृ० ५४६, पं० १४

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७१ ललित विस्तर, पृ० १७०, पं० १

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७२ वही, पृ० १८६, पं० ७

दक्षिण भारत की वेश-भूषा

c11.s11.1

प्राचीन तामिल साहित्य में ऐसे बहुत से उल्लेख हैं जिनसे इस युग में दक्षिण भारत

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की वेश-भूषा का पता चलता है। दक्षिणी राजे धोती और जड़ाऊदार टोपी पहनते थे७३। तामिल लोगों की वेश-भूषा उनके सामाजिक स्थान और जातियों को लेकर भिन्न भिन्न तरह की होती थी। शुद्ध तामिल समाज में मध्यवर्ग के लोगों की पोशाक दो टुकड़े कपड़ों की होती थी। एक टुकड़ा वे धोती की तरह पहनते थे और दूसरा सिर पर बांधते थे७४। अपने सिर के लंबे बालों के वे सिर के ऊपर अथवा बगल में जूड़े बांधते थे। बाल बांधने के फीते चमकीली फूदनेदार डोरियों और मनकों के बने होते थे७५। नाग जाति का एक सरदार धोती पहने बतलाया गया है७६। अंगरक्षक सिपाही कोट पहनते थे। यवन सिपाही जो राजमहल अथवा राजशिविर पर पहरा देते थे कंचुक पहनते थे७७। युद्धक्षेत्र में एक तामिल राजा के शिविर पर पहरा देते हुए यवन सिपाहियों का निम्नलिखित वर्णन तामिल साहित्य में एक जगह आया है

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७३ कनक सभाई, तामिल एट्टीन हंड्रेड इयर्स एगो, पृ० ११०

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"लोहे की सिकड़ियों से नथी हुई दोहरे कपड़े की कनातों से युक्त एक खेमे पर कमर पेटी से बंधे ढीले और लंबे कोट पहने और अपने गंभीर चेहरों से दर्शकों के मन में भय उत्पन्न करने वाले यवन सिपाही पहरा दे रहे थे। जिरह बस्तर पहने इशारे से बात करनेवाला एक प्रहरी सुंदर दीप से आलोकित अंतर गृह पर धीरे धीरे घूमते हुए रात भर पहरा दे रहा था७८।"

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७८ वही, पृ० ३७-३८

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तामिल स्त्रियां एड़ी तक पहुंचती साड़ी पहनती थीं। कमर के ऊपर शरीर का नंगा भाग चंदन और सुगंधित चूर्णों से सज्जित होता था७९। बार वनिताएं केवल जांघों के मध्य तक पहुंचती साड़ी पहनती थीं जिसका पोत इतना महीन होता था कि शरीर नंगा देख पड़ता था८०। जंगली स्त्रियां हरी पत्तियों से बनी घघरियाँ पहनती थीं८१।

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७४-७७ वही, पृ० ११७

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७९ वही, पृ० ११७

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८० वही,

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८१ वही, पृ० ११८

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