Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.4
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.4
- Language
- Hindi
c13.4
विश्रृंखलित राज्यतंत्र के इस युग में भारतीय वेश-भूषा के इतिहास की कम सामग्री मिलती है। इस युग में हमें सांची और अमरावती के से अर्धचित्र प्राप्त नहीं हैं जिनके बल पर हम तत्कालीन वेश-भूषा का सांगोपांग चित्र खड़ा कर सकें। मथुरा की तथाकथित कुषाणयुग की कुछ मूर्तियों का सहारा हम इस युग की वेश-भूषा के इतिहास के लिए ले सकते हैं। पर इसमें कठिनाई है कुषाण कला से तात्पर्य। कुषाण कला गोल तरह से दो सौ वर्षों तक जारी रही और अभी तक कला के इतिहासकारों ने इस कला में विकासक्रम का पता लगाने का प्रयत्न तक नहीं किया है। कुषाण कला के माने कुषाण युग के कला के सिद्धांतों पर आश्रित कला है चाहे वह पहली शताब्दी की हो या तीसरी। जैसा हमें मालूम है आरंभिक कुषाणयुग में सुंदर से सुंदर मूर्तियां काफी संख्या में बनी, लेकिन इसका कोई कारण नहीं मालूम पड़ता कि कुषाणों के पतन के और गुप्तों के अभ्युत्थान के अन्तर युग में भी यह कला जीवित नहीं रही। लेकिन इस प्रश्न के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए तथा ऐतिहासिकता के कठोर मापदंडों को सामने रखते हुए हमने इस युग की अधिकतर मूर्तियों और अर्धचित्रों का उपयोग तीसरी शताब्दी की भारतीय वेश-भूषा के इतिहास के लिए नहीं किया है।