Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.7
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.7
- Language
- Hindi
c13.7
गुप्तयुग भारतीय वेश-भूषा के इतिहास में बड़ा महत्त्व रखता है। इस युग की वेश-भूषा के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री हमें सारनाथ, देवगढ़ इत्यादि से मिली मूर्तियों और अजंटा की १७ नंबर की लेण से मिलती है। वास्तव में अजंटा की लेणें वाकाटकों की राज्य-सीमा में हैं और इसलिए शायद अजंटा की चित्रकला को गुप्त शैली की मानना ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत हो। पर जैसा कि भारतीय कला के इतिहास से पता चलता है उत्तर भारत में परिवर्धित गुप्तकला का भारतवर्ष के कोने कोने में समावेश हुआ और उसकी सौंदर्य भावना और अंकन शैली का प्रभाव देश में सर्वत्र पड़ा फिर चाहे वह सिंध में मीरपुरखास से मिली मूर्तियां हों अथवा अजंटा के भित्तिचित्र । अगर यह दृष्टिकोण हम ध्यान में रक्खें तो इस युग की प्रादेशिक कलाओं को चाहे वह गुप्त साम्राज्य के बाहर ही क्यों न परिवर्धित हुई हों हम गुप्तकला के अन्तर्गत मान सकते हैं। जो भी हो इस युग की मिट्टी की मूर्तियों, सिक्कों और भित्तिचित्रों के आधार पर हम चौथी से सातवीं शताब्दी तक के भारतीय कपड़ों और पहरावे का जीता जागता चित्र खड़ा कर सकते हैं।