Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.8
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.8
- Language
- Hindi
c13.8
गुप्तवंश की नींव चन्द्रगुप्त प्रथम (३२०-३३५ ई० स०) ने डाली पर समुद्रगुप्त (३३५-३८५ ई० स०) ने जो भारतवर्ष के इस काल के शासकों में अपनी दूरदर्शिता, पराक्रम और कला-प्रेम के कारण एक विशेष स्थान रखते हैं, इस नींव को मजबूत किया। अनेक विजय यात्राओं के अलावा जिनका हमसे संबंध नहीं है, समुद्रगुप्त साहित्य-व्यसनी, कवि और संगीतज्ञ थे । उनके पुत्र और उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (३८५-४१३ ई०) ने ३९५ और ४०० ई० के बीच में सौराष्ट्र के क्षत्रपों को जीत लिया । चन्द्रगुप्त अपनी कीर्ति और यश के बल पर आज तक भारत में विख्यात हैं। इन्हीं के राज्यकाल, में महाकवि कालिदास हुए । समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त के विजय-पराक्रमों से परिवर्धित गुप्त-साम्राज्य का, जैसा कि वसाढ़, भीटा और राजघाट से मिली मुद्राओं से पता चलता है, कार्य संचालन सुव्यवस्थित था। कुमारगुप्त (४१४-४५५ ई०) का राज्यकाल गुप्त-साम्राज्य की क्रमशः अवनति का है। स्कंदगुप्त (४५५-४७० ई०) के राज्यकाल में हूणों के भीषण आक्रमण से आक्रांत गुप्त-साम्राज्य छिन्न भिन्न हो गया, और इस तरह भारत के स्वर्ण-युग के इतिहास पर परदा पड़ गया । स्कंदगुप्त के पराक्रम का पता हमें भितरी के स्तंभोत्कीर्ण लेख से पता लगता है जिसमें कहा गया है कि जमीन पर अपने सिपाहियों के साथ सोकर मानो उन्होंने तप करते हुए अपनी विचलित कुललक्ष्मी की आराधना की । इस