Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s2.11
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s2.11
- Language
- Hindi
c13.s2.11
गुप्तयुग में विदेशी वस्त्रों की ओर झुकाव की तुलना हम मुगलयुग में भारतीय पहरावे पर तुर्की प्रभाव से कर सकते हैं। मध्य एशिया के निवासी मुगल अपनी वेश-भूषा इस देश में लाये और यह वेश-भूषा समायांतर में भारतीयता के ढांचे में ढल कर जातीय पोशाक बन गयी और उसे राजकर्मचारियों और व्यापारियों ने अपना लिया । जामा, पगड़ी, पाजामा, कमरबंद और पटके जातिभेद और वर्णभेद छोड़ कर सभी के वस्त्र बन गये । कुषाणयुग में भी भारतीय वेश-भूषा में कुछ ऐसा ही परिवर्तन हुआ था गो कि उसका प्रभाव इतना व्यापक नहीं था जैसा मुगल युग में । भारतीय दृष्टि में शक तुषार बर्बर थे इसलिए उनकी वेश भूषा भी मान्य नहीं थी । जब गुप्त कुषाणयुग की संस्कृति के उत्तराधिकारी हुए तो उन्होंने कुषाणयुग की वेश-भूषा की उपयोगिता देखते हुए उसे थोड़े फेर-फार के साथ अपना लिया। लेकिन इस वेश-भूषा को जबर्दस्ती दूसरों पर लादने का प्रश्न ही नहीं उठता था और इसीलिए विदेशी पोशाक उन्हीं तक सीमित रही जिन्हें वह प्रिय थी और जिन्हें अपने दैनिक जीवन में उसकी उपयोगिता का ज्ञान था । हमारी अधिकतर जनता इस युग में भी अपने पुराने कपड़े जो इस देश के लिए उपयुक्त थे, पहनती रही।