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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s36.46

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s36.46

Language
Hindi

c13.s36.46

जैन साधुओं और साध्वियों की उपरोक्त वेश भूषा में हम एक सामाजिक विकास की क्रिया का दर्शन कर सकते हैं। हमें आचारांग सूत्र के पहले भाग से पता लगता है कि घोर कष्टमय तपस्या ही जैन धर्म का चरम लक्ष्य था। सामाजिक बंधनों को ख्याल में रख कर दो चार मोटे वस्त्र वे अपने अंग ढांकने के लिए रख सकते थे पर इन वस्त्रों का उद्वेश्य होता था केवल शरीर रक्षा और सामाजिक नियमों का पालन। गुप्त काल में सामाजिक व्यवस्था बदल गयी थी अच्छी और सुसंस्कृत वेश भूषा लोगों को अत्यंत रुचिकर हो गयी थी। बौद्ध भिक्षुओं को तो इस समय कपड़ों के विषय में विशेषकर विदेशों में जाने पर काफी स्वतंत्रता थी। जैन साधुओं को भी भखमार कर यह स्वतंत्रता कुछ अंशों में देनी ही पड़ी और प्राचीन वस्त्र संबंधी कठोर नियम ढीले करने पड़े। वस्त्र संबंधी इन्हीं नये आदेशों को बृहत् कल्प सूत्र में पाया जाता है। अगर जैन धर्म को सजीव होकर आगे बढ़ना था तो उन्हें जैसा देस वैसा भेस स्वीकार करने की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य की कहानी छेद सूत्रों में है।

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