Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s36: जैन छेद सूत्रों में आए अनेक तरह के जूते
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s36
- Language
- Hindi
जैन छेद सूत्रों में आए अनेक तरह के जूते
c13.s36.1
जैन छेद सूत्रों से पता चलता है कि उस युग में चमड़े के तरह तरह के जूते बनते
c13.s36.2
१६० —रायपसेणिय, पं० बेचरदास द्वारा संपादित, पृ० १२३-२४
c13.s36.3
थे । जूते बनाने के लिए बृहत् कल्पसूत्र में गाय, भैंसे, बकरे, भेड़ और दूसरे वन्यपशुओं के चमड़े गिनाये गये हैं१६३ । जैन साधु और साध्वियां किसी तरह के नापदार अथवा रंगीन चमड़े की वस्तुओं का व्यवहार नहीं कर सकते थे१६४ । इस उल्लेख से यह आशय निकाला जा सकता है कि उस युग में तरह तरह के नाप और शकल के तथा रंगीन चमड़ों से जूते बनते थे जिनकी जन साधारण में काफी मांग थी । प्रमाण और वर्ण के अनुसार इन्हें चार भागों में; यथा सकल कृत्स्न, प्रमाण कृत्स्न, वर्णं कृत्स्न और बंध कृत्स्न में बांट दिया गया है१६५ ।
c13.s36.4
१६३ बृहत् कल्पसूत्र, ४, ३८२४
c13.s36.5
१६४ वही, पृ० १०५६
c13.s36.6
१६५ वही, ४, ३८४६
c13.s36.7
सकल कृत्स्न—ये एक तल्ले जूते (एकपुट या एकतलं) होते थे१६६ । इस एक तल्ले जूते को जिसे तलिका कहते थे जैन साधु रात में कांटों से बचने के लिए पहन सकते थे । दिन में ये जूते तब पहने जा सकते थे जब सार्थवाह जिसके साथ जैन साधु चल रहे हों पगडंडी का रास्ता पकड़े क्योंकि ऐसे समय जूते पहनने से चलने में आसानी होती थी१६७ ।
c13.s36.8
१६७ वही, २, २८८४
c13.s36.9
प्रमाण कृत्स्न—इन जूतों में दो तीन अथवा इनसे भी अधिकतर तल्ले होते थे१६८ ।
c13.s36.10
१६८ वही, ४, ३८४७ [^१६६-२००]: वही
c13.s36.11
खल्लका—टीका के अनुसार इसके अर्ध खल्लक और समस्त खल्लक दो भेद होते थे । अर्ध खल्लक जूते आधे पैर ढंकते थे और समस्त खल्लक पूरे पैर१६६ ।
c13.s36.12
१६६ वही, ४, ३८४७
c13.s36.13
खपुसा—ये जूते घुटनों तक पहुंचते थे२०० । इनके संबंध में हम आगे चल कर कुछ और कहेंगे ।
c13.s36.14
वागुर—इन जूतों से पैर और अंगुलियां ढंक जाती थीं ।
c13.s36.15
कोशा—इससे चलने में अंगूठों के नखों की पत्थरों की ठोकरों से रक्षा होती थी
c13.s36.16
जंघा और अर्धजंघा—जंघा पूरे जंघेको और अर्ध जंघा आधे जांघ को ढंक लेता था२०१ ।
c13.s36.17
२०१ वही, ४, ३८४७
c13.s36.18
पुटक—यह जूते तसमों से बने होते थे और इनके पहनने से जाड़े में पैरों की फटने से रक्षा होती थी२०२ ।
c13.s36.19
२०२ वही, ३, २८८४
c13.s36.20
कोशक और खपुसा नाम के जूते, सरदी, बर्फ, सांप और कांटों से बचने के लिए
c13.s36.21
पहने जाते थे । यह साफ है कि वे जूते ठंडे देशों में पहने जाते थे । जैन साधुओं को भी इन देशों में बिना प्रायश्चित के ऐसे जूते पहनने की आज्ञा थी२०३ ।
c13.s36.22
२०३ वही, ३, २३८५
c13.s36.23
सकल कृत्स्न जूतों की निम्नलिखित व्याख्या दी गयी है । ये जूते (क्रमणिका) परों के नाप के अनुसार बनाये जाते थे और मध्य या और किसी भाग में ये कटे जुड़े नहीं होते थे२०४ । तात्पर्य यह है कि ये जूते एक पूरे चमड़े से बनते थे ।
c13.s36.24
२०४ वही, ४, ३८४८
c13.s36.25
वर्ग कृत्स्न जूते सफेद अथवा रंगीन चमड़ों से बनते थे२०५ ।
c13.s36.26
२०५ वही, ४, ३८५१
c13.s36.27
बंधन कृत्स्न—इन जूतों में तीन से अधिक बंद होते थे२०६ । एक दूसरी जगह२०७ इस जूते में सन अथवा सूत की दो या उससे अधिक पंक्तियों में सिलाइयां अथवा बंद होने की बात आयी है ।
c13.s36.28
२०६ वही
c13.s36.29
२०७ वही, ४, ३८६६
c13.s36.30
जूतों के बंद—जूतों अथवा बूटों में दो बंद होते थे, सन का बना एक बंद घुटने पर होता था दूसरा पैर की अंगुलियों पर । कुछ जूतों में तीन बंद होते पर एक घुटने पर होता था दूसरा पैर के अंगूठे पर और तीसरा पैरों की शेष चार अंगुलियों पर२०८ ।
c13.s36.31
२०८ वही, ४, ३८७०
c13.s36.32
जूतों की उपरोक्त किस्मों में खल्लक और खपुसा अजंटा के भित्ति चित्रों और गुप्त सिक्कों में आते हैं ।
c13.s36.33
जैसा हम पहले कह आए हैं उपरोक्त किस्मों के जूते जो शोभाजनक समझे जाते थे जैन साधु नहीं पहन सकते थे । उनके जूते अट्ठारह टुकड़ों में कटे और सिले होते थे । रंगीन चमड़ों से उनके जूते नहीं बन सकते थे और उनमें केवल एक तल्ला और एक ही बंद (एकबंधं) विहित था२०९ ।
c13.s36.34
२०९ वही, ४, ३८७३
c13.s36.35
जैन साधुओं को भिन्न भिन्न तरह के जूते न पहनने देने के निम्नलिखित कारण थे, (१) चमड़े के व्यवहार के माने, गाय और दूसरे पशुओं के प्रति क्रूरता थी२१० । (२) जूतों कड़ाई से चलने में छोटे छोटे जंतुओं की हत्या होती थी२११ । (३) बिना जूता पहन कर चलने में लोग सावधानी से कांटे इत्यादि देख कर चलते थे । ऐसा करने से उन्हें क्षुद्र कीटादि
c13.s36.36
२१० वही, ४, ३८५६
c13.s36.37
२११ वही, ४, ३८५७
c13.s36.38
भी दीख जाते थे और उन्हें बचा कर वे आगे बढ़ते थे, लेकिन जूते पहन कर चलने से मनुष्य कांटों और जीवों की कम परवाह करता था२१२। जूते पहनते ही हम पशुओं के प्रति क्रूरता स्वीकार कर लेते हैं२१३। क्षुद्र जीव स्वभाव से ही कोमल होते हैं इसलिए वे जूते की चाप सह नहीं सकते२१४।
c13.s36.39
२१२ वही, ४, ३८५८
c13.s36.40
२१३ वही, ४, ३८५९
c13.s36.41
२१४ वही, ४, ३८६१
c13.s36.42
धार्मिक दृष्टि से जूते न पहनना चाहे जितना पुण्य कार्य रहा हो दैनिक जीवन में यह संभव नहीं था कि जैन साधु जूते पहनने से बच सकें, और इसीलिए हम इनके जूते न पहनने के साधारण नियम में कुछ अपवाद पाते हैं। विहार करते समय, बीमारी में, प्राकृतिक रूप से कोमल पैर वालों को, चोरों और वन्य पशुओं से सर्वदा त्रस्त साधुओं को, कुष्ठ, अर्श से पीड़ित तथा कम देखने वाले साधुओं को, तथा विहार में निकले छुल्लकों और साध्वियों को जूते पहनने की आज्ञा थी। पारिवारिक विपत्ति तथा संघ और देश पर आयी विपत्तियों के समय भी अविहित जूते बिना किसी संकोच के पहने जा सकते थे२१५। विहार यात्रा में साधुओं को कोश तथा खपुसा नाम के जूते पहिनने का आदेश था२१६। अगर साधुओं को अविहित जूते पहनने ही पड़ते थे तो उन्हें काले रंग के जूते पहनने का आदेश था, उनके न मिलने पर लाल अथवा किसी दूसरे रंग के जूते पहने जा सकते थे पर ऐसा करने के पहले यह आवश्यक था कि उनके रंग विकृत कर दिये जावें२१७।
c13.s36.43
२१५ वही, ४, ३८६२
c13.s36.44
२१६ वही, ४, ३८६३
c13.s36.45
२१७ वही, ४, ३८६७
c13.s36.46
जैन साधुओं और साध्वियों की उपरोक्त वेश भूषा में हम एक सामाजिक विकास की क्रिया का दर्शन कर सकते हैं। हमें आचारांग सूत्र के पहले भाग से पता लगता है कि घोर कष्टमय तपस्या ही जैन धर्म का चरम लक्ष्य था। सामाजिक बंधनों को ख्याल में रख कर दो चार मोटे वस्त्र वे अपने अंग ढांकने के लिए रख सकते थे पर इन वस्त्रों का उद्वेश्य होता था केवल शरीर रक्षा और सामाजिक नियमों का पालन। गुप्त काल में सामाजिक व्यवस्था बदल गयी थी अच्छी और सुसंस्कृत वेश भूषा लोगों को अत्यंत रुचिकर हो गयी थी। बौद्ध भिक्षुओं को तो इस समय कपड़ों के विषय में विशेषकर विदेशों में जाने पर काफी स्वतंत्रता थी। जैन साधुओं को भी भखमार कर यह स्वतंत्रता कुछ अंशों में देनी ही पड़ी और प्राचीन वस्त्र संबंधी कठोर नियम ढीले करने पड़े। वस्त्र संबंधी इन्हीं नये आदेशों को बृहत् कल्प सूत्र में पाया जाता है। अगर जैन धर्म को सजीव होकर आगे बढ़ना था तो उन्हें जैसा देस वैसा भेस स्वीकार करने की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य की कहानी छेद सूत्रों में है।
Cites (3)
- Āyāraṃga — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
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