Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.1
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.1
- Language
- Hindi
c4.1
कुछ वर्षों से भारतीय संस्कृति का नाम देश विदेशों में फैल रहा है और लोग उस संस्कृति के सब अंगों को जानने के लिए उत्सुक हैं। पर अभाग्यवश भारतीय संस्कृति का अर्थ अभी तक इस देश की गूढ़ विचारधाराओं और नाना मत-मतांतरों तक ही सीमित है। भारतीय दर्शनों और धर्मों के प्रति इस अनुराग का नतीजा यह हुआ है कि संस्कृति के दूसरे अंग अछूते ही छूट गये हैं। विद्वानों ने भारतीय कला का, जो हमारी प्राचीन संस्कृति का एक विशिष्ट अंग है, कुछ न कुछ अध्ययन किया है, पर उसके समझाने में कुछ विद्वानों द्वारा छायावादी विचारों का आश्रय लेने से, हम उस कला में केवल अपनी दार्शनिक मनोवृत्तियों का ही प्रतिबिम्ब देखने लगे हैं। कला के इस दार्शनिक रूप की विचारधारा इतने कठिन शब्दों में व्यक्त की जाती है कि बिना भारतीय दर्शन के ज्ञान के वह समझी तक नहीं जा सकती। कला के दार्शनिक सिद्धांतों पर इतना अधिक जोर देने का नतीजा यह हुआ है कि 'कला के लिए कला' के सिद्धान्त को ले कर हम भारतीय कला की समीक्षा करने में डरते हैं। दर्शन की पेचीदा विचारधाराओं में डूब कर कला अपना निजत्व खो बैठती है। कला की दार्शनिक पृष्ठिका भारतीय कला के उस महत् उद्देश्य की अवहेलना करती है, जिसके अनुसार लोक जनित कला सब के जीवन और भावनाओं का प्रतिबिम्ब है और जिसके द्वारा रसानुभूति करने का सब को अधिकार है।