Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.120
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.120
- Language
- Hindi
c4.120
प्राक् गुप्तयुग में हमें भारतीय वेश-भूषा का कम मसाला मिलता है । मथुरा से मिली इस युग की कुछ मूर्तियां तथा पर्वाय के अर्ध चित्रों के बल पर हम उत्तर भारत की वेश-भूषा का पता पाते हैं। दक्षिण भारत की वेश-भूषा का गोल्ली के अर्ध चित्रों में अच्छा प्रदर्शन है। खास गुप्त युग की वेश-भूषा के इतिहास की सामग्री हमें सारनाथ, देवगढ़, मंदोर इत्यादि से मिली मूर्तियों और अजंटा के १७ नं० की लेण के भित्ति चित्रों में मिलती है । अजंटा की लेणें गुप्त-साम्राज्य में नहीं थीं, पर गुप्तयुग की कला स्थानिक न होकर देश के कोने-कोने में फैल चुकी थी और इस दृष्टि से अजंठा की कला को गुप्त कला के अन्तरगत मानना ठीक ही है । गुप्त सिक्कों पर अंकित प्रतिकृतियों से भी तत्कालीन वेश-भूषा पर काफी प्रकाश पड़ता है। इनसे पता लगता है कि गुप्तयुग के आरंभ में राजां की वेश-भूषा शकों जैसी थी, गो कि वे कभी-कभी भारतीय वस्त्र भी पहनते थे, लेकिन इस युग के अंत में उनका पहिरावा पूर्ण भारतीय बन गया। रानियां कंचुक और साड़ियां पहनतीं थीं। सिक्कों पर आये वस्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह भी पता लगता है कि गुप्त-युग में भद्दे शक वस्त्रों में आकर्षण लाकर उन्हें भारतीय बाना दे दिया गया ।