Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.144
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.144
- Language
- Hindi
c4.144
गाय, भैंस, बकरे इत्यादि के चमड़ों से इस युग में तरह-तरह के जूते बनते थे । ये जूते प्रमाण और वर्ण के अनुसार सकल, प्रमाण, वर्ण और बंधकृत्स्न में बंटे थे । सकलकृत्स्न एक तल्ले जूते होते थे और प्रमाण-कृत्स्न दो या इनसे अधिक तल्लों वाले जूते । खल्लक बूट नुमा जूते होते थे । इनके दो उपभेदों में अर्ध-खल्लक आधे पैर ढकते थे और समस्त खल्लक पूरे पैर । वागुर से पैर की अंगुलियां ढक जाती थी और कोशा से ठोकर लगने से बचाव होता था । जंघा पूरे जंघे को ढकता था और अर्धजंघा आधे जंघे को । तसमेदार जूते को पुटक कहते थे । कोशक और खपुसा सरदी और बरफ से बचने के लिए पहने जाते थे । सकलकृत्स्न जूते एक चमड़े से बने होते थे और वर्णकृत्स्न रंगीन चमड़े से । बंधकृत्स्न जूते में कई बंद होते थे । जो घुटनों और पैर की अंगुलियों पर होते थे । उपरोक्त किस्म के जूते केवल गृहस्थ पहन सकते थे । जैन साधू तो कई टुकड़े चमड़ों से बने एक तल्ले जूते ही पहन सकते थे । कुछ अवसरों पर जैसे यात्रा, बीमारी, आकस्मिक विपत्ति में अविहित जूते भी पहने जा सकते थे ।