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Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.182

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.182

Language
Hindi

c4.182

प्रागैतिहासिक काल से सातवीं सदी तक की वेश-भूषाओं और कपड़ों के वर्णन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारतीय वेश-भूषा के इतिहास में भी एक विकास क्रम हूं, जिसके अनुसार समय-समय पर इसमें लोगों के रुचि के अनुसार और विदेशियों के संसर्ग से परिवर्तन होते आये। हमारा देश उष्ण प्रधान है और इसीलिए यहाँ सिले वस्त्रों को उतनी प्रधानता नहीं मिली जितनी कि ठंडे देशों में । कपड़े सिले न होने से उनमें एक सादगी है, पर मनुष्य की रुचि सर्वदा से बनाव चुनाव की ओर अधिक रही है और इसी लिए हम इन सादे वस्त्रों में भी बनाव चुनाव अधिक पाते हैं। शिरोवस्त्र और पगड़ियों के इतने प्रकार तो शायद ही और किसी देश में और किसी काल में मिलते हों। सारांश यह है कि अगर वेश-भूषा के पैमाने से भी हम भारतीय सभ्यता को जांचें, तो भी वह किसी प्राचीन सभ्यता से कम नहीं रहेगी ।