Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.28
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.28
- Language
- Hindi
c4.28
महाजनपद युग, शैशु नागों और नंदों (६४२-३२० ई० पू०) में भारतीय सभ्यता और आगे बढ़ी। इस युग के इतिहास की सामग्री हमें जैन सूत्रों, बौद्ध पिटकों और ब्राह्मण सूत्र ग्रंथों में मिलती है । इस युग की आर्य सभ्यता ग्रामों से निकल कर नगरों में पहुँच चुकी थी और देश का कला-कौशल काफी आगे बढ़ चुका था। कपास, क्षोम, रेशम और ऊनी कपड़ों का काफी चलन था। जातकों में सुईकार (पेसकार), बेंत बिनने वालों (नलकार) और बुनकर (तंतुवाय) के व्यवसायों को नीचकर्म कहा है । उपरोक्त भाव बौद्धों के नहीं हो सकते, क्योंकि बुद्ध तो जात-पांत मानते ही न थे, लगता है कहानियों में जाति पांति की भावना वैदिक समाज की वर्ण-व्यवस्था की द्योतक है । जैन सूत्र तो दर्जियों, बुनकरों इत्यादि को शिल्पायों की श्रेणी में रखते हैं ।