Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.41
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.41
- Language
- Hindi
c4.41
जूते पहनने का काफी रवाज था। जूतों में एक से लेकर चार तल्ले तक होते थे और वे तरह-तरह के रंगीन चमड़ों से बनते थे; लेकिन ऐसे जूते केवल गृहस्थ ही पहन सकते थे। जूतों में निम्नलिखित प्रकार होते थे—पुटबद्ध (घुटने तक के जूते), पालिगुंठिम (पैर ढकने वाले जूते), सल्लकबद्ध (आधुनिक पेशावरी जूते जैसा), मेंडविषाण वद्धिक (जूते के नोक पर मेंड़ की सींग होती थी), अजविषाण वद्धिक (बकरे की सींग वाला), वृश्चिकालिक (जूरे पर बिच्छू की पूंछ जैसा अलंकार होता था), मोरपिंछपरिक्खित्त (तल्ले या बंदों में मोर पंख सिले होते थे), तूलपुष्णिक (रूंई से भरा जूता) और तितिर पट्टिक (तीतर के पंखों जैसी बनावट)। बौद्ध भिक्षु उपदेश सुनते समय जूते और चप्पल नहीं पहन सकते थे। उपरोक्त जूतों के अलावा बहुत से वन्यपशुओं के चमड़ों से भी जूते बनते थे। जूते पहनने का इस युग में इतना रवाज था कि चर्मकार के व्यवसाय का जातकों में कई बार उल्लेख आया है। जूतों के सिवाय गृहस्थ तृण, मूंज, तालपत्र, बांस और लकड़ी की बनी चपलें और पादुकाएं भी होती थीं। कुछ शौकीन लोग सोने चांदी और रत्नों से जड़ित पादुकाएं भी पहनते थे।