Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.47
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.47
- Language
- Hindi
c4.47
कौटिल्य अर्थशास्त्र में चमड़ों और समूरों की विशद व्याख्या है । कान्तानावक एक नीले रंग का चमड़ा होता था और प्रेयक सफेद और नीले रंग का मूंजली और पारोदार चमड़ा। इसब-नाम से बिसी, जो बालदार और चित्तीदार होता था तथा महाविसी जो सुरसुरा और सफेद होता था, आते थे । हिमालय प्रदेश के आरोह नामक स्थान से गुलदार श्यामिका, भूरे और फाख्ताई रंग की कालिका, काले भूरे और लाल रंग के कदली चर्म, गोल चित्तीदार चन्द्रोत्तरा और शाकुला नाम के चमड़े और समूर आते थे । बल्ख से काले समूर, चीन देश के समूर और गेहुएं रंग के सामुली आते थे । ऊद विलाव के चमड़ों में सातौना काले रंग का होता था, नलतुला हरे रंगका। डूबदुबका का रंग भूरी होता था और इसमें ऊद बिलाव की पूंछ भी होती थी । चिकने, मुलायम और मन्निभ्न रोम वाले समूर अच्छे माने जाते थे । गोह, चीते, सूंस, सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसे, सुरागाय और गयाल के चमड़े भी काम में आते थे ।