Pracin Bharatiya Veshabhusha c5.4
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c5.4
- Language
- Hindi
c5.4
या दूसरी शताब्दी में लिखा तो उसने बाबुल का ग्रीक नाम जो सिकंदर के समय से चल चुका था क्यों न देकर उसके पहले चलने वाले ईरानी नाम का क्यों प्रयोग किया। इन सब तर्कों से यह पता चलता है कि पश्चिमी पुरातत्त्ववेत्ता और भाषाशास्त्री भारतीय सभ्यता को मिश्र और बाबुल की प्राचीन सभ्यताओं की कोटि में नहीं आने देना चाहते थे। इस बात से उनका पक्षपात तो साबित होता है पर प्रमाणाभाव से हम उनकी विधिवत युक्तियों के खंडन में प्रायः असमर्थ थे । लेकिन उनका मत कुछ दिनों तक ही चल सका। १९२२ ई० में मोहेन-जोदड़ो के एक बौद्धस्तूप की खुदाई करते हुए श्री राखालदास बेनर्जी को सिंधु-घाटी की प्रागैतिहासिक सभ्यता का पता चला। मोहेनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई जैसे जैसे आगे बढ़ती गयी वैसे वैसे भारतीय सभ्यता की प्राचीनता के ठोस सबूत मिलते गये और पुरातत्त्ववेत्ताओं ने एक स्वर से इस बात को स्वीकार कर लिया कि भारतीय सभ्यता प्राचीनता में सुमेर और मिश्र की सभ्यताओं से न केवल टक्कर ही लेती है वरन कुछ बातों में जैसे नगर रचना में तो उनसे भी आगे बढ़ जाती है।