Pracin Bharatiya Veshabhusha c5.5
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c5.5
- Language
- Hindi
c5.5
इस सिंधुघाटी की प्रागैतिहासिक सभ्यता के जो कुछ भी अवशेष मिले हैं उनसे पता चलता है कि यह सभ्यता वैदिक सभ्यता से कहीं आगे बढ़ी हुई थी। सिंधुसभ्यता ३००० ई० पू० या ४००० वर्ष पूर्व फूल फल रही थी और इसमें वैदिक आर्यों की सभ्यता का कोई लेश नहीं मिलता। इस सभ्यता का संबंध सुमेर, अक्काड और एलम से भी था और अफगानिस्तान, कश्मीर और सुदूर दक्षिण से भी। उस प्राचीन काल में भी सिंधुघाटी की सभ्यता काफी आगे बढ़ी हुई थी। बड़े बड़े शहरों में लोग रहते थे । गेहूँ और जौ की खेती होती थी और लोग बैल, भैंसे, भेड़ें, सूअर, कुत्ते तथा हाथी पालते थे । सवारी के लिए वे पहियेदार गाड़ियों का व्यवहार करते थे। वे धातुओं के सामान और औजार बना सकते थे। लड़ाई और शिकार में वे धनुष बाण, भाले, कुल्हाड़ियाँ, छुरे तथा गदा व्यवहार में लाते थे । उनके घरेलू मिट्टी के बरतन चाक पर चढ़े होते थे और अक्सर उन पर अलंकार बने होते थे। समृद्धजन प्रसाधन के लिए सोने, ताँबे, कच्चे शीशे, हाथीदांत और अकीक इत्यादि की मणियों से बने गहने पहनते थे, गरीब मिट्टी तथा शंख के बने गहनों ही पर संतोष करते थे । लेखन कला से भी वे अवगत थे । सभ्यता के इतने आगे बढ़ने पर भी सिंधु सभ्यता में वस्त्र काफी सादे होते थे । साधारणतः लोग लंगोटी या तहमत पहनते थे। बहुधा लोग नंगे भी रहते थे । कभी कभी चादर से छाती ढंकी होती थी। बाल बहुधा फीतों से बंधे रहते थे। स्त्रियों के शिरोवस्त्र कभी कभी पंखे के आकार के होते थे ।