Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.6
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.6
- Language
- Hindi
c6.6
वैदिक साहित्य भारतीय सभ्यता के १००० वर्षों से अधिक विकास के इतिहास का भण्डार है। लेकिन उसमें जो कुछ आया है उसे हम एक ही काल में नहीं ढूंढ़ सकते, उसमें ऐतिहासिक विकास की परंपरा दिखलाने के लिए हमें काल विभाजन का सहारा तो लेना ही होगा। जहां तक वस्त्र-भूषा का संबंध है हमारी कठिनाई कुछ इसलिए सरल हो जाती है कि संहिताओं, ब्राह्मणों और उपनिषदों में आनुषंगिक रूप से वस्त्रों की जो भी चर्चा आई है उसमें एकता है जिससे यह पता चलता है कि जहां तक वस्त्रों का संबंध है वैदिक काल में करीब ८०० वर्षों तक विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। इसके दो कारण हो सकते हैं; (१) अपने प्रारंभिक वेश-भूषा के प्रति आर्यों का मोह, गो कि वैदिक साहित्य के कुछ शब्दों से यह पता चलता है कि आर्यों ने भारत में अपने पूर्व के निवासी द्रविड़ों और निषाद जातियों से कुछ वस्त्र ग्रहण किये थे। (२) इतिहास में बहुधा यह देखा गया है कि किसी नवीन सभ्यता के सम्पर्क में आने से अथवा उससे विजित होने पर विजित सभ्यता विजेताओं के वस्त्र ग्रहण कर लेती थी। उदाहरण के लिए करीब २९०० ई० पू० में जब अक्काद के लोगों ने सम्पूर्ण सुमेर पर अपना अधिकार जमा लिया तो प्राचीन सुमेर के लोगों ने 'कौनाकेस' या तहमत की जगह जो उनका जातीय वस्त्र था अक्कादियों के वस्त्र कमीज और चादर को अपना लिया। लेकिन वैदिक साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि न तो वे बाहरी किसी शक्ति से विजित हुए न उनके विशेष संपर्क में आये। इसीलिए उनके अपने वस्त्र जिनमें उन्होंने देश काल के अनुसार सुधार भी कर लिये होंगे ज्यों के त्यों बने रहे। वस्त्रभूषा की इस एकता को देखते हुए हमने संपूर्ण वैदिक युग को एक ही माना है और इसके काल विभाजन नहीं किये हैं। हां सूत्र युग में जिसका आरंभ करीब ५०० ई० पू० से होता है हमें नये वस्त्रों के नाम मिलने लगते हैं और इसीलिए हमने इस सूत्र युग की वेश-भूषा का वर्णन महाजनपद युग की वेश-भूषा के अंतर्गत किया है।