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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6: द्वितीय अध्याय : वैदिक युग में वेश-भूषा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6

Language
Hindi

Contents

द्वितीय अध्याय : वैदिक युग में वेश-भूषा

c6.1

वैदिक युग में वेश-भूषा

c6.2

सिंधु सभ्यता के समाप्त होने से लेकर ई० पू० तीसरी शताब्दी तक हमें भारतीय सभ्यता के इतिहास के लिए पुरातत्व की अधिक सामग्री नहीं मिलती । मोहेनजोदड़ो के नष्ट होने (२५०० ई० पू०) और आर्यों के भारत आने (१५०० ई० पू०) के बीच में जो एक हज़ार वर्ष का अंतर पड़ता है उसमें भारतीय सभ्यता किस तरह से फूली फली इसका भी हमें ठीक ज्ञान नहीं है।

c6.3

जब सिंधु सभ्यता के बाद ऐतिहासिक अंधकार का परदा उठता है तो हमें वैदिकयुग का दर्शन मिलता है, और भारत की आरंभिक आर्य सभ्यता का दर्शन कराने के लिए हमारे सामने ऋग्वेद के मंत्र आते हैं। लेकिन वैदिक सभ्यता कोई एक काल विशेष तक सीमित नहीं थी वह तो १५०० ई० पू० से लेकर करीब ५०० ई० पू० तक बढ़ती और प्रसरित होती रही । पहले संहिताएं बनीं, बाद में ब्राह्मण ग्रंथ, और अंत में उपनिषद् और सूत्र ग्रंथ । काल क्रम के पैमाने में आगे या पीछे होने से वैदिक साहित्य में भी एक ऐतिहासिक विकास क्रम पाया जाता है। वैदिक साहित्य के विभिन्न ग्रंथों के समय निर्धारित करने की विद्वानों ने चेष्टा की है लेकिन अभी तक वे दृढ़ता के साथ वैदिक ग्रंथों का समय निश्चित नहीं कर सके हैं।

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वैदिक साहित्य के काल क्रम की यह गड़बड़ी जब हम वैदिक सभ्यता का इतिहास लिखने बैठते हैं तो बड़ी खलती है, क्योंकि हम दृढ़तापूर्वक यह नहीं कह सकते कि सभ्यता के प्रतीक अमुक अंग का आरंभ और विकास समय के पैमाने में कब से कब तक हुआ । साधारणतः हम ऋग्वेद को वैदिक आर्यों का आदि ग्रंथ मान कर उसी के आधार पर आरंभिक आर्य सभ्यता का रूप खड़ा करते हैं, लेकिन अथर्ववेद और कहीं कहीं ब्राम्हणों में भी आर्य और अनार्य सभ्यताओं के कुछ ऐसे प्रारंभिक रूप आये हैं जो ऋग्वेद के समकालीन हो सकते हैं। बात यह है कि ऋग्वेद कोई इतिहास का ग्रंथ तो है नहीं जिसमें तत्कालीन सभ्यता के सब रूप आने ज़रूरी थे। वह तो दान तथा देव स्तुतियों और दार्शनिक विचारों का एक संग्रह मात्र है। जिसमें वैदिकसभ्यता के भिन्न भिन्न पहलुओं के संकेत आनुषंगिक रूप से हो गये हैं। वैदिक युग की भारतीयसभ्यता के अनेक प्रतीक श्रुत वा दृश्य अथर्ववेद और कहीं कहीं ब्राह्मणों में बाद में आये लेकिन केवल बाद में आने ही से तो यह कहा नहीं जा सकता कि उनका विकास बाद में हुआ । बहुधा वैदिक साहित्य के अध्ययन में ऐसी अड़चनों का हमें सामना करना पड़ता है और तब हमें बुद्धि और वैज्ञानिक

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तर्क की तराजू पर यह तौल कर देखना पड़ता है कि पलड़ा किस पक्ष का भारी है और उसी के अनुसार हमें अपनी राय कायम करनी पड़ती है। ऐसे समय हमें पुरातत्व का कोई सहारा न मिलना बड़ा खलता है क्योंकि साहित्य तो साहित्य ही है केवल उसी के सहारे हम उस वैज्ञानिक तथ्य तक नहीं पहुंच सके जिस पर हम वैज्ञानिक पुरातत्व की खोजों से पहुंच सकते हैं। पुरातत्व के सहारे हम सभ्यता संबंधी साहित्यिक उद्धरणों की जांच पड़ताल करके उनके कालसम्बन्धी एक विशेष निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं, पर कोरे साहित्य से और ऐसे साहित्य से जिसका काल अभी विवादग्रस्त है हमारा विशेष काम नहीं निकल सकता। लेकिन जब हमारे पास पुरातत्व के साधन नहीं हैं तो हमें लाचार होकर साहित्य का आश्रय लेना ही पड़ता है। फिर चाहे उससे निकाले गये नतीजे कितने ही विवादग्रस्त क्यों न हों।

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वैदिक साहित्य भारतीय सभ्यता के १००० वर्षों से अधिक विकास के इतिहास का भण्डार है। लेकिन उसमें जो कुछ आया है उसे हम एक ही काल में नहीं ढूंढ़ सकते, उसमें ऐतिहासिक विकास की परंपरा दिखलाने के लिए हमें काल विभाजन का सहारा तो लेना ही होगा। जहां तक वस्त्र-भूषा का संबंध है हमारी कठिनाई कुछ इसलिए सरल हो जाती है कि संहिताओं, ब्राह्मणों और उपनिषदों में आनुषंगिक रूप से वस्त्रों की जो भी चर्चा आई है उसमें एकता है जिससे यह पता चलता है कि जहां तक वस्त्रों का संबंध है वैदिक काल में करीब ८०० वर्षों तक विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। इसके दो कारण हो सकते हैं; (१) अपने प्रारंभिक वेश-भूषा के प्रति आर्यों का मोह, गो कि वैदिक साहित्य के कुछ शब्दों से यह पता चलता है कि आर्यों ने भारत में अपने पूर्व के निवासी द्रविड़ों और निषाद जातियों से कुछ वस्त्र ग्रहण किये थे। (२) इतिहास में बहुधा यह देखा गया है कि किसी नवीन सभ्यता के सम्पर्क में आने से अथवा उससे विजित होने पर विजित सभ्यता विजेताओं के वस्त्र ग्रहण कर लेती थी। उदाहरण के लिए करीब २९०० ई० पू० में जब अक्काद के लोगों ने सम्पूर्ण सुमेर पर अपना अधिकार जमा लिया तो प्राचीन सुमेर के लोगों ने 'कौनाकेस' या तहमत की जगह जो उनका जातीय वस्त्र था अक्कादियों के वस्त्र कमीज और चादर को अपना लिया। लेकिन वैदिक साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि न तो वे बाहरी किसी शक्ति से विजित हुए न उनके विशेष संपर्क में आये। इसीलिए उनके अपने वस्त्र जिनमें उन्होंने देश काल के अनुसार सुधार भी कर लिये होंगे ज्यों के त्यों बने रहे। वस्त्रभूषा की इस एकता को देखते हुए हमने संपूर्ण वैदिक युग को एक ही माना है और इसके काल विभाजन नहीं किये हैं। हां सूत्र युग में जिसका आरंभ करीब ५०० ई० पू० से होता है हमें नये वस्त्रों के नाम मिलने लगते हैं और इसीलिए हमने इस सूत्र युग की वेश-भूषा का वर्णन महाजनपद युग की वेश-भूषा के अंतर्गत किया है।

c6.7

आर्यों का आदि स्थान कहां था इस प्रश्न पर तो काफी बहस रही है लेकिन इतना

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तो निश्चित जान पड़ता है कि आर्य भारतवर्ष में और पश्चिमी एशिया में एक साथ प्रविष्ट हुए और ईरानी और भारतीय आर्य करीब २५०० ई० पू० में अलग हुए। भारतीय आर्यों ने इस देश में २००० ई० पू० और १४०० के बीच अफगानिस्तान और हिंदूकूश के रास्ते से होकर प्रवेश किया और सबके पहले सिंध नदी की उपरली घाटी में बसे। बाद में उन्होंने धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए गंगा की घाटी में भू-स्थापना की और अंत में विध्यक्षेत्र और सुदूर दक्षिण में फैल गये। पशु पालन और कृषि इनके प्रधान व्यवसाय थे और आरंभिक काल में वे गांवों में रहते थे । गृह निर्माण, बड़ईगिरी और रथ बनाने की कला में वे पटु थे । अयस के बरतन बना सकते थे और सोने और गहनों के उपयोग वे करते थे । वे कपड़े भी बुन सकते थे। सीने पिरोने, चमड़े कमाने और मिट्टी के बरतन बनाने की कलाओं से भी वे परिचित थे ।

ऊनी वस्त्र

c6.s1.1

आर्य कातने और बुनने के लिए भेड़ों का ऊन व्यवहार में लाते थे और इसीलिए भेड़ को वे ऊर्णावती१ कहते थे और ऊन को आविक२। सिंध की घाटी को सुवासा ऊर्णावती इसलिए कहा गया है कि वहां ऊन और ऊनी कपड़े बहुतायत से मिलते थे३ । गंधार की भेड़ें प्रसिद्ध थीं४ और जिस प्रदेश से रावी (परुष्णी) बहती थी वहां का रंगीन अथवा धुला हुआ (सुन्ध्यवः) ऊनी कपड़ा प्रसिद्ध था५। पूषण द्वारा ऊनी कपड़े विनने का भी उल्लेख है६ ।

c6.s1.2

१ ऋ० वे०, ८।६७।३

c6.s1.3

२ बृहदारण्यक उ०, २।३।६

c6.s1.4

३ ऋ० वे०, १०।७५।८

c6.s1.5

४ ऋ० वे०, १।१२६।७

c6.s1.6

५ ऋ० वे०, ४।२२।२ ; ५।५२।६

c6.s1.7

६ ऋ० वे०, १०।२६।६

कंबल और शामुल्य

c6.s2.1

कंबल७ और शामुल्य८ स्त्रियों और पुरुषों के नित्य के पहिनने के वस्त्र थे। कंबल से शायद खुरदरे ऊनी कपड़े का तात्पर्य रहा हो । प्रो० प्रिजलुस्की के मतानुसार९ कंबल मुंडा-ख्मेर भाषा का शब्द है और वैदिक संस्कृत ने इस शब्द को उस भाषा से उधार लिया है। अथर्ववेद में सबसे पहले यह शब्द आने से यह धारणा होती है कि इस शब्द को आर्यों ने आदिवासियों से अधिक घनिष्ठता बढ़ने पर अपना लिया। शामुल्य समूर का बना कपड़ा होता था। पर

c6.s2.2

७ अथर्ववेद, १४।२।६६, ६७

c6.s2.3

८ ऋ० वे० १०।८५।२६; अथ० वे० १४।१।२५

c6.s2.4

९ प्री आर्यन एण्ड प्री ड्रीविडियन, पृ० ६-८, श्री बागची द्वारा संपादित

c6.s2.5

शामुल्य के संबंध में डा० सुविमलचंद्र सरकार१० का और ही मत है। उनका विचार है कि शामुल्य रुई भरा कोई हल्का कपड़ा था। वे हमारा ध्यान इस ओर भी दिलाते हैं कि आधुनिक शमला जो एक संकरा शाल है, और जिसका व्यवहार पगड़ी पर के बंद के लिए होता है और जिसकी व्युत्पत्ति अरबी शामिलात से जिसके अर्थ होते हैं जोड़ना, वास्तव में शामुल्य से निकला है। इस धारणा को सत्य मानने में कई कठिनाइयां हैं। शामुल्य को रुई से भरा वस्त्र मानने में संदेह होता है क्योंकि रुई का ज्ञान, जैसा कि हम आगे चल कर देखेंगे, आर्यों को सूत्र काल में हुआ। शामुल्य तो समूर शब्द का प्राचीन रूप मात्र है जिसका अर्थ आज दिन भी रोएंदार चमड़ा होता है। इसी अर्थ में इस शब्द का व्यवहार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी हुआ है।

c6.s2.6

१० सरकार, सम आस्पेक्टस् ऑफ दी अर्लियस्ट सोशियल हिस्ट्री ऑफ इंडिया, पृ० ५१, फु० नो० ६

खालों के वस्त्र

c6.s3.1

जानवरों की खालों का भी वस्त्ररूप में व्यवहार होता था। देवता, मुनि, व्रात्य और देश के आदि निवासी खालों से बने कपड़े पहनते थे। इस संबंध में शतपथ ब्राह्मण११ में एक कहानी दी हुई है जिससे पता चलता है कि वैदिक सभ्यता के आरंभिक युग में आर्य गोचर्म पहना करते थे। कहानी यह है कि मनुष्य एक समय गोचर्म से आच्छादित होता था। गाय की उपादेयता का देवताओं को ज्ञान था और इसीलिए मनुष्य के शरीर से गोचर्म उन्होंने खलिया कर पुनः गायों को वापस कर दिया। खाल के बिना मनुष्य को बराबर चोटें लगा करती थीं। इसलिए उनका खोया हुआ आवरण पुनः वापस देने केलिए देवताओं ने वस्त्रों की सृष्टि की। इस कहानी से यह निष्कर्ष निकलता है कि सभ्यता के आरंभिक युग में आर्य गोचर्म पहना करते थे। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस समय सभ्यता शिकारी अथवा पशुपालक अवस्था में थी उस समय मनुष्य पशुओं के चमड़ों से अपने बदन ढांका करते थे। प्राचीन सुमेर में भी लोग सारगान के काल तक बकरे की खाल की बनी तहमत पहना करते थे। ऐसा लगता है कि जब आर्यों की सभ्यता उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ी तो उन्हें गाय की आर्थिक उपयोगिता का ज्ञान हुआ और चमड़े के लिए व्यर्थ गो-हत्या का निषेध करके वे और तरह तरह के वस्त्र पहनने लगे।

c6.s3.2

११ शतपथ ब्रा०, ३।१।१३-१६

कृष्णाजिन

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शतपथ ब्राह्मण की१२ एक दूसरी कहानी से पता लगता है कि कृष्णाजिन बहुत ही पवित्र माना जाता था। कहानी यह है कि यज्ञ की आहुति एक समय मृग का रूप धारण

c6.s4.2

१२ शतपथ ब्रा०, १।१।४।१

c6.s4.3

कर के देवताओं से बचने के लिए भाग गयी। देवताओं को जब इसका पता लगा तो उन्होंने उसे पकड़ कर उसकी खाल उतार लिया । उसी दिन से कृष्णाजिन पर दीक्षा दी जाने लगी और यज्ञ की आहुति के लिए धान्य भी उस पर घोटा जाने लगा। यज्ञादिक कार्यों में मृगचर्म का व्यवहार विहित है। इसी बात को साबित करने के लिए ऊपर की कहानी गढ़ी गयी है। कहानी हमारी उस पूर्वकालीन संस्कृति की ओर भी इशारा करती है जब धार्मिक कार्यों में मृगचर्मों का प्रयोग बेधड़क होता था । आज दिन भी धार्मिक कार्यों में मृगचर्म पवित्र माना जाता है।

c6.s4.4

मरुत् हिरन की खालें पहनते थे१३ । हिरन की खालें पहन कर और उन्हीं के चमड़े की बनी ढालें लेकर देवगण शत्रुओं में भय उत्पन्न करते थे१४ । मुनिगण भूरे और कमाए हुए चमड़े (पिशङ्गमला) पहनते थे१५ । ब्रात्यों के अधिनायक और उनके साथी दोहरे (द्विसंहितानि) चमड़े पहनते थे जिसमें एक काला (कृष्ण) और दूसरा सफेद (वलक्ष) होता था१६ । जंगली जातियां नाच के समय कृत्ति और दूर्श पहनती थीं१७, और अजिन भी व्यवहार में लाती थीं१८। यज्ञ के समय कृष्ण मृगचर्म पहना जाता था१९ । बकरे की खाल (अजर्षभ्यस्य अजिन) पहनी जाती थी२० । समूर के व्यापार का भी उल्लेख है२१ ।

c6.s4.5

१३ ऋ० वे०, १।१६६।१०

c6.s4.6

१४ अ० वे०, ५।२१।७

c6.s4.7

१५ अ० वे०, १०।१३६।२

c6.s4.8

१६ पञ्चविंश ब्रा०, १७।१-१५

c6.s4.9

१७ अ० वे०, ८।६।११

c6.s4.10

१८ अ० वे०, ४।७।६

c6.s4.11

१९ अ० वे०, ५।२१।७; ६।२१।८५

c6.s4.12

२० शत० ब्रा०, ३।६।१।१२; ५।२।२।२४

c6.s4.13

२१ वाजसनेयी सं०, ३०।१५; तैत्तिरीय ब्रा०, ३।२।१३।१

c6.s4.14

कुछ और तरह के भी कपड़े व्यवहार में लाये जाते थे पर उनका कोई विवरण न प्राप्त होने से उनकी पहचान में काफी कठिनाई पैदा होती है और न ठीक ठीक से यह कहा जा सकता है कि वे वनस्पतियों के किन किन रेशों से बनते थे ।

बरासी

c6.s5.1

बरासी का उल्लेख सबसे पहले काठक संहिता२२ में आया है। आश्वलायन श्रौत सूत्र२३ और लाट्यायन श्रौत सूत्र२४ के अनुसार बरासी वस्त्र सोमयाग में भाग लेने वाले नेष्ट्र को

c6.s5.2

२२ काठक सं०, १५।४; पंचविंश ब्रा०, १८।६।६

c6.s5.3

२३ आ० श्रौ० सू०, २।३।४।१७

c6.s5.4

२४ ला० श्रौ० सू०, ६।२।१५

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दक्षिणा के रूप में दिया जाता था। लाट्यायन श्रौत सूत्र के टीकाकार को इस शब्द का ठीक ठीक अर्थ का पता नहीं था और इसीलिए उसने वरासी को क्षौम्य अर्थात् अतसी की छाल के रेशे का बना वस्त्र कहा है। आश्वलायन श्रौत सूत्र के टीकाकार ने बरासी का अर्थ मोटे सूत का कपड़ा किया है। डा० सरकार के मत से उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और हिमालय के बहिर्गिरि पर उगने वाले वरस (एक प्रकार के लाल फूल वाला रोडोडेंड्रन) नाम के वृक्ष की छाल के रेशे से शायद यह वस्त्र बुना जाता था२५।

c6.s5.6

२५ सरकार, वही, पृ० ६१, फु० नो० ३

दूर्श

c6.s6.1

इस कपड़े का उल्लेख अथर्ववेद में आया है२६। पालिसाहित्य में भी दुस्स नाम के कपड़े का उल्लेख आया है। आज दिन धुस्सा जो दूर्श से निकला है एक तरह की खरदरी ऊनी चादर का नाम है जो पंजाब और कश्मीर में बनती है, पर यह ठीक तौर से नहीं कहा जा सकता कि वैदिक युग में दूर्श का क्या रूप था।

c6.s6.2

२६ अ० वे०, ४।७।६; ८।६।११

क्षौम

c6.s7.1

क्षुमा अथवा अतसी की छाल के रेशे से बने हुए वस्त्र का सर्वप्रथम उल्लेख मैत्रायणी संहिता और तैत्तिरीय संहिता में आया है२७। कुसमी रंग के क्षौम परिधान का उल्लेख शाङ्खायन आरण्यक२८ में आया है। आश्वलायन श्रौत सूत्र२९ के अनुसार क्षौम वस्त्र सोमयाग में नेष्ट्र को दक्षिणा रूप में दिया जाता था।

c6.s7.2

२७ मै० सं०, ३।६।७; तै० सं०, ६।१।१।३

c6.s7.3

२८ शा० आ०, ११।४

c6.s7.4

२९ आ० श्रौ० सू०, २।३।४।१७

पाण्ड्व

c6.s8.1

शतपथ ब्राह्मण और मैत्रायणी३० संहिता के अनुसार पाण्ड्व वस्त्र यज्ञ के समय राजाओं द्वारा पहना जाता था। बृहदारण्यक उपनिषद्३१ में पाण्ड्वाधिक वस्त्र का उल्लेख है। यह भेड़ के ऊन का बना हुआ सफेद वस्त्र होता था। डा० सरकार का कहना है कि शायद पाण्ड्व कोरा अथवा रंगीन रेशमी अथवा सूती वस्त्र था३२। उनके ऐसा कहने का आधार क्या है यह नहीं कहा जा सकता।

c6.s8.2

३० श० ब्रा०, ५।३।५।२१; मै० सं०, ४।४।३

c6.s8.3

३१ बृ० उ०, २।३।६

c6.s8.4

३२ सरकार, वही, पृ० ५१

तार्प्य

c6.s9.1

तार्प्य का उल्लेख अथर्ववेद तथा और कई जगह आया है३३ । कृष्ण यजुर्वेद३४ के अनुसार यज्ञ के अवसर पर यजमान को स्वयं तार्प्य पहनना पड़ता था। राजसूय यज्ञ३५ के अवसर पर राजा तार्प्य वस्त्र जिस पर यज्ञ के उपादानों के रूप कढ़े या टंके होते थे पहनता था। सायण और कात्यायन ने तार्प्य के बहुत से अर्थ दिये हैं। यथा क्षौम, घी में डूबा वस्त्र, तृप नाम की घास से बना हुआ, अथवा तीन बार घृत में डुबोया हुआ वस्त्र इत्यादि । तार्प्य की इन सब व्याख्याओं से यह पता चलता है कि टीकाकारों को इस शब्द के अर्थ के बारे में दुविधा थी। कुछ ऐसा भी मालूम पड़ता है कि शतपथकार को भी इस शब्द के ठीक अर्थ के बारे में शक था। गोल्डस्टुकर के मत से सहमत होते हुए एगंलिग का कहना है कि तार्प्य किसी तरह का अधोवस्त्र था३६। डा० सरकार तार्प्य को बिहार के टसर से, जो एक तरह का मोटा रेशमी कपड़ा होता है, तुलना करते हैं३७। डा० सरकार इस पहचान पर कैसे पहुंचे यह कहना कठिन है। सत्य तो यह है कि तार्प्य का ठीक ठीक अर्थ अभी हमें विदित नहीं है।

c6.s9.2

३३ अ० वे०, १८।४।३१; तै० सं०, २।४।११।६; मै० सं०, ४।४।३

c6.s9.3

३४ तै० ब्रा०, १।३।७।१

c6.s9.4

३५ श० ब्रा०, ५।३।५।२०, सर्वाणि यज्ञरूपाणि निस्यूतानि ।

c6.s9.5

३६ एगलिंग, शतपथ ब्रा०, भा० ३, पृ० ८८, फु० नो० १

c6.s9.6

३७ डा० सरकार, वही, पृ० ६, फु० नो० ५

कार्पास

c6.s10.1

जैसा हम पहले अध्याय में कह आये हैं सिंधु सभ्यता के युग में कपास से बने कपड़े पहने जाते थे। आश्चर्य की बात है कि वैदिक संहिताओं और ब्राह्मणों में कार्पास का कहीं भी उल्लेख नहीं है। सब से पहले कपास का उल्लेख आश्वलायन और लाट्यायन श्रौत सूत्रों३८ में आया है । इन उल्लेखों के अनुसार सोमयज्ञ के पोतृ को कपास का कपड़ा (कार्पास संवास:) दक्षिणा के रूप में दिया जाता था । अब प्रश्न यह उठता है कि क्या कारण था कि वैदिक आर्य कपास से इतने काल तक अनभिज्ञ थे ? उत्तर कई हो सकते हैं यथा (१) वैदिक आर्यों से और सिंधु सभ्यता से कोई सरोकार नहीं था और वे भारत में उस काल में आये जब सिंधु सभ्यता पूर्णतः नष्ट हो गयी थी और इसलिए उस सभ्यता के एक प्रतीक कपास की कताई बुनाई का उन्हें ज्ञान नहीं हुआ। यह ज्ञान उन्हें तब हुआ जब वे पूर्व भारत में पहुंचे जहां कपास के व्यवहार से, जैसा हमें पालि साहित्य बतलाता है, लोग भली भांति परिचित थे। (२) यह भी संभव है कि आर्यों को कपास का ज्ञान रहा हो लेकिन एक अनार्य वस्तु होने से उसके व्यवहार से वे हिचकिचाते रहे हों, गोकि इसकी संभावना कम है।

c6.s10.2

३८ आ० श्रौ० सू०, २।३।४।१७; ला० श्रौ० सू०, २।६।१; ६।२।१४

कताई बुनाई

c6.s11.1

कातने और बुनने का काम प्रायः स्त्रियों के जिम्मे था३९।

c6.s11.2

३९ अ० वे०, १०।७।४२; १४।२।५१

c6.s11.3

अथर्ववेद४० के एक रूपक में रात्रि और दिवा को भगिनी मान कर उन्हें वर्षरूपी कपड़े को बुनते बतलाया है। इसमें रात को ताना और दिन को बाना माना है। कपड़े बुनने वालियों के लिए वयित्री४१ और सिरी४२ शब्दों का उपयोग हुआ है। डा० सरकार के अनुसार वैदिक सिरी तामिल सिलै से लिया गया है और पूर्वी जानपदी भाषाओं में अब भी इसका रूप सिरी, सिली, सिलाई होता है जिसका अर्थ बुना हुआ कपड़ा होता है ।

c6.s11.4

४० अ० वे०, १०।७।४२

c6.s11.5

४१ पञ्च० ब्रा०, १।८।६; श० ब्रा०, ३।१।२।१३ इत्यादि

c6.s11.6

४२ अ० वे०, १४।२।५१

c6.s11.7

वैदिक साहित्य में बुनने की कारीगरी के बहुत से पारिभाषिक शब्द आये हैं। ओतु (बाना)४३, तंतु (सूत)४४, तंत्र (ताना)४५, वेमन् (करघा)४६, प्राचीनतान (आगे खिंचा हुआ ताना)४७, वाय (बुनकर)४८, मयूख (ढरकी या शीशे का वजन)४९ बुनाई संबंधी शब्द हैं।

c6.s11.8

४३ ऋ० वे०, ६।९।२-३; तै० सं०, ६।१।१४

c6.s11.9

४४ अ० वे०, १४।२।५१; श० ब्रा०, ३।१।२।१८

c6.s11.10

४५ ऋ० वे०, १०।७१।६

c6.s11.11

४६ वाजसनेयी सं०, १९।८३

c6.s11.12

४७ तै० सं०, ६।१।१।४

c6.s11.13

४८ ऋ० वे०, १०।२६।६

c6.s11.14

४९ वा० सं०, १९।८०-८३

पहनने के कपड़े

c6.s12.1

ऋग्वेद५० और बाद के साहित्य में पहनने के कपड़ों के लिए साधारणतः वासस् शब्द का व्यवहार हुआ है। वसन५१ और वस्त्र५२ के भी वही माने होते हैं। वैदिक आर्य अपने कपड़े बड़े शौक से पहनते थे । सुवसन५३ का व्यवहार खूबसूरत कपड़ों तथा अच्छी तरह से पहने

c6.s12.2

५० ऋ० वे०, १।३४।१; १।११५।४; ८।३।२४

c6.s12.3

५१ ऋ० वे०, १।१६।७

c6.s12.4

५२ ऋ० वे०, १।२६।१

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५३ ऋ० वे०, ६।५१।४

c6.s12.6

गये वस्त्र दोनों ही के लिए हुआ है५४। सुवासस्५५ विशेषण का प्रयोग अच्छे कपड़े पहनने वालों के लिए हुआ है। सुरभि५६ शब्द से पता चलता है कि पहनने के कपड़े बदन पर ठीक बैठते थे। समाज में बढ़िया कपड़े पहनने वालों के मान होने का उल्लेख शतपथ५७ में आया है। इस उल्लेख के अनुसार मनुष्य कपड़ा इसलिए पहनता है कि वह उसके बदन पर चमड़े की तरह शरीर की रक्षा का काम देता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि मन से मनुष्य अच्छे कपड़े पहने (सुवासा एव बुभूषेत्)। अनेक रंग विरंगे कपड़े पहनने की भी प्रथा थी। शतपथ में अग्नि का एक पर्याय विभावसु५८ भी है जिसका अर्थ है रंग बिरंगे कपड़े पहनने वाला। कौषीतकी ब्राह्मण५९ में अच्छे कपड़े पहनने वाले युवकों का उल्लेख है।

c6.s12.7

५४ ऋ० वे०, ६।४७।५०

c6.s12.8

५५ ऋ० वे०, १।१२४।७; ३।८।४

c6.s12.9

५६ ऋ० वे०, ६।२९।३

c6.s12.10

५७ श० ब्रा०, ३।१।२।१६

c6.s12.11

५८ श० ब्रा०, ६।४।४।८

c6.s12.12

५९ कौ० ब्रा०, १०।२

वैदिक वस्त्रों पर अलंकार

c6.s13.1

वैदिक युग में कपड़ों पर बहुधा कसीदे का काम बना होता था। मरुत् कारचोबी के काम वाले कपड़े पहनते थे६० (हिरण्यान् प्रति अतकान्)। कपड़ों में किनारे और झालरें भी होती थीं। सिच्६१ शब्द से कसीदा किये हुए किनारे या झालर का बोध होता है। दो ऊपर नीचे के और दो बगल के किनारों का उल्लेख आया है६२। वैदिक आरोकाः६३ से शायद कपड़े पर बने अलंकारों से मतलब है। डा० सरकार का विचार है६४ कि आरोकाः की व्युत्पत्ति तामिल अरुकणि से है जिसके अर्थ होते हैं कपड़ों के अलंकृत किनारे। यज्ञ के अवसर पर कोरे कपड़े६५ पहने जाते थे पर अन्य अवसरों पर धुले कपड़े (स्वित्यञ्चः)६६। सुनहले काम वाले रंगीन कपड़े ऊषा की श्रेणी वाली रंगीली स्त्रियां पहनती थीं६७। व्रात्य गृहस्थ किनारेदार नीले कपड़े पहनने के शौकीन थे६८।

c6.s13.2

६० ऋ० वे०, ५।५५।६

c6.s13.3

६१ ऐत० ब्रा०, ७।३२; श० ब्रा०, ४।२।२।११

c6.s13.4

६२ सरकार, वही, पृ० ६३

c6.s13.5

६३ श० ब्रा०, ३।१।२।१३

c6.s13.6

६४ सरकार, वही, पृ० ६३, फु० नो० १२

c6.s13.7

६५ श० ब्रा०, ३।१।२।१३

c6.s13.8

६६ ऋ० वे०, ७।३३।१

c6.s13.9

६७ ऋ० वे०, १।६२।४, अधिपेशांसि वपते नृतूः इइव; १०।१।६

c6.s13.10

६८ पञ्चविंश ब्रा०, १७।१४।६

कसीदे का काम

c6.s14.1

पेशस्६९ शब्द का व्यवहार कारचोबी के काम वाले वस्त्रों के लिए हुआ है। इसमें कढ़े हुए अलंकार काफी फेरदार और कलात्मक होते थे७०। नृतु को पेशांसि पहने बतलाने से७१ शायद कारचोबी पेशवाज से तात्पर्य हो। कसीदा काढ़ना या उससे पेशांसि अथवा पेशवाज बनाना स्त्रियों का काम था। यजुर्वेद में पुरुषमेध में बलि देने जाने वालों में पेशकारी का नाम आया है७२। ऐतरेय ब्राह्मण७३ में निविदों को ऋचाओं का कसीदा अथवा पेशस् कहा गया है। यहाँ जो उपमा दी गई है उससे कसीदे के बारे में कुछ प्रकाश पड़ता है। इस तरह का काम (पेशस्) ताने के ऊपरी भाग (प्रवयण) तथा मध्य और निचले भागों (अवप्रञ्जन) में किया जाता था। पेशस् के इस विवरण से पता चलता है कि अलंकार कुछ बुने भी जाते थे और कुछ काढ़े भी। अगर हमारा यह अनुमान ठीक है तो कौटिल्य में वर्णित खचित नामक दुशाले जो सूचीवान कर्म से बनाये जाते थे और जिन्हें कश्मीर वाले अब भी तीलीकार और अम्लीकार का संयोग बताते हैं, और पेशस् एक थे। बृहदारण्यक उपनिषद्७४ के एक उल्लेख से पता चलता है कि पेशकारी एक अलंकार को काढ़ कर जब दूसरा काढ़ती थी तो वह पहले अलंकार से भी अधिक सुन्दर उतरता था।

c6.s14.2

६९ ऋ० वे०, ४।३६।७

c6.s14.3

७० ऋ० वे०, २।३।६

c6.s14.4

७१ ऋ० वे०, १।६२।४-५

c6.s14.5

७२ वाजसनेयी सं०, ३०।६

c6.s14.6

७३ ऐतरेय ब्रा०, ३।१०

c6.s14.7

७४ बृ० उ० ४।४।४ तद्यथा पेशकारी पेशसो मात्रामुपादायान्यतरं कल्याणतरं रूपं तनुत ।

वैदिक आर्यों का पहरावा

c6.s15.1

ऐसा मालूम पड़ता है कि वैदिक आर्य तीन कपड़े पहिनते थे यथा नीवि७५ (लंगोटी), वासस् और अधिवास७६ जो शायद आधुनिक दुपट्टे या चादर का प्रारंभिक रूप रहा हो। शतपथ७७ में दिये हुए यज्ञ काल के पहरावे से उपरोक्त पहरावों का मेल खाता है।

c6.s15.2

७५ अ० वे०, ८।२।१६; १२।२।५०

c6.s15.3

७६ ऋ० वे०, १।१४०।६; १०।५।४

c6.s15.4

७७ शतपथ ब्रा०, ५।३।५।२०

नीवि

c6.s16.1

नीवि या परिधान७८ शायद तहमत या लुंगी के ऐसा कोई वस्त्र था जिसे स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से व्यवहार में लाते थे। नीवि की व्युत्पत्ति नि अर्थात् नीचे और व्ये

c6.s16.2

७८ बृहदारण्यक उप०, ६।१।१०

c6.s16.3

ढकना या आच्छादित करना से की गयी है । लेकिन डा० सरकार इसे चौड़ा बुना हुआ किनारा मानते हैं और इस शब्द की व्युत्पत्ति तमिल नइ से जिसके अर्थ बुनने के होते हैं करते हैं७९। जब तक वैदिक काल की कोई मूर्ति हमें नहीं मिलती तब तक हम यह ठीक तौर से नहीं कह सकते कि वैदिक नीवि का क्या रूप था। लेकिन सिंधु सभ्यता की मुद्राओं और मृण्मूर्तियों में जो पोशाक दिखलायी गयी है वह तो केवल एक कपड़े का संकरा सा टुकड़ा है जिसे स्त्री और पुरुष दोनों लपेट लिया करते थे । इस तरह के वस्त्र पहनने का रिवाज सिंधु सभ्यता की समकालीन सभ्यताओं में भी था। हो सकता है कि वैदिक युग में देश का यह पुराना पहरावा बच गया हो और कालांतर में आर्यों द्वारा अपना लिया गया हो ।

c6.s16.4

७९ —सरकार वही, पृ० ६३, फु० नो० ६

प्रघात और वातपान

c6.s17.1

नीवि से प्रघात लटका करता था । इसका एक बेबुना छोर फूंदनों से सजा होता था और दूसरा सादा छोर एक छोटी झालर से जिसे तूप कहते थे८०। नीवि में वातपान८१ भी होता था । यह शायद कपड़े में लंबाई वाला किनारा था जो हवा के झटके से सूत को बाहर निकलने से रोकता था८२।

c6.s17.2

८० —तै० सं०, १।८।१।१

c6.s17.3

८१ —तै० सं०, ६।१।१

c6.s17.4

८२ —सरकार, वही, पृ० ६३

कपड़े पहनने के ढंग

c6.s18.1

वेदों से जो कुछ भी हमें वस्त्रों के उल्लेख मिलते हैं उनसे यह ठीक ठीक पता नहीं चलता कि वैदिक युग में कपड़े किस ढंग से पहने जाते थे । इस बात का उल्लेख है कि वासस्८३ बांधा जाता था । नीविंकृ८४ से पता चलता है कि शायद लोग नीवि इस ढंग से बांधते थे जिससे उसमें गांठें और सिलवटें पड़ें जो देखने में सुन्दर मालूम पड़ती हैं ।

c6.s18.2

८३ —अ० वे०, १४।२।७०

c6.s18.3

८४ —ऋ० वे०, ८।२४।१६

शरीर के ऊपर पहनने के वस्त्र

c6.s19.1

पुरुष और स्त्रियां अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को ढांकने के लिए उपवसन पर्याणहन, प्रतिधि, द्रापि और अत्क पहनती थीं । उपवसन८५ जैसा कि वधू के वस्त्रों के सम्बन्ध में इसके उल्लेख से पता लगता है, दुपट्टे की तरह कोई वस्त्र था । मुद्गलानी के उपवसन८६ के हवा

c6.s19.2

८५ —अ० वे०, १४।२।४१६

c6.s19.3

८६ —ऋ० वे०, १०।१०२।२

c6.s19.4

में फड़कने के उल्लेख से यह बोध होता है कि यह उत्तरीय जैसा कोई वस्त्र था। डा० सरकार का अनुमान है पर्याणहन शायद लंबी-चौड़ी हल्की चादर की तरह कोई वस्त्र था८७। अधिवास राजाओं का ऊपरी वस्त्र था८८। प्रतिधि८९ एक या दो कपड़े की छींटों से बना स्तनपट्ट था जिसे विवाह के समय कन्या पहनती थी। शायद यह सीधे अथवा तिरछे ढंग से स्तनों को ढांकने के लिए पहना जाता था।

c6.s19.5

८७ सरकार, वही, पृ० ६६

c6.s19.6

८८ शतपथ ब्रा०, ५।४।४।३

c6.s19.7

८९ अ० वे०, १४।१।७

वैदिक साहित्य में सिले कपड़े

c6.s20.1

इन बेसिले कपड़ों के अतिरिक्त वैदिक साहित्य में सिले कपड़ों के भी उल्लेख हैं। अत्क९० शब्द का व्यवहार पहनने के कपड़े के अर्थ में ऋग्वेद में आया है, और इसका यही अर्थ रोथ, लुडविग्, ग्रासमान और त्तिमर ने ग्रहण किया है। अत्क केवल पुरुष पहनते थे और यह लंबा९१, पूरा शरीर ढकने वाला९२, चपक कर बैठने वाला९३, चमकीला९४, सुन्दर९५ कारचोबी किया हुआ अथवा सोने के तार से बुना हुआ९६ एक वस्त्र था। उपरोक्त विवरण से अनुमान किया जा सकता है कि अचकन या कुरते के आकार का यह कोई वस्त्र था। वैदिक युग के बाद साहित्य में फिर इसका उल्लेख नहीं आता। द्रापि चपक कर बैठने वाला९७, कारचोबी किया हुआ९८ कोटनुआ९९ कपड़ा था, जिसे पुरुष१०० और स्त्री१०१ दोनों पहनते थे।

c6.s20.2

९० ऋ० वे०, १।६५।७; ४।१८।५

c6.s20.3

९१ ऋ० वे०, २।३५।१४

c6.s20.4

९२ ऋ० वे०, ५।७४।५

c6.s20.5

९३ ऋ० वे०, ६।२६।३

c6.s20.6

९४ ऋ० वे०, ६।२६।३

c6.s20.7

९५ ऋ० वे०, ६।१०७।१३

c6.s20.8

९६ ऋ० वे०, १।१२२।२; ५।५५।६

c6.s20.9

९७ ऋ० वे०, १।१६६।१०

c6.s20.10

९८ ऋ० वे०, १।२५।१३

c6.s20.11

९९ अ० वे०, १३।३।१

c6.s20.12

१०० ऋ० वे०, ६।१००।६

c6.s20.13

१०१ अ० वे०, ५।७।१०

उष्णीष या पगड़ी

c6.s21.1

उष्णीष शब्द का पगड़ी के अर्थ में प्रयोग सब से पहले अथर्ववेद१०२ और पञ्चविंश

c6.s21.2

१०२ अ० वे०, १५।२।१

c6.s21.3

ब्राह्मण के१०३ व्रात्य प्रकरण में आया है। ऐतरेय१०४ और शतपथ में१०५ इस शब्द का प्रयोग राजाओं और व्रात्यों के पहरावों के संबंध में आया है। राजे वाजपेय१०६ और राजसूय१०७ के अवसरों पर उष्णीष धारण करते थे। इन्द्राणी सम्राज्ञी की हैसियत से उष्णीष पहनती थी१०८। व्रात्यों का उष्णीष सफेद होता था। सूत्रों के अनुसार उष्णीष में कई फेंटे होते थे, और वह जरा एक तरफ झुका कर बांधा जाता था१०९। यज्ञ के अवसर पर उष्णीष के दोनों छोर आगे लाकर उसकी तहों में खोंस दिये जाते थे११०। लगता है राजाओं के उष्णीष के छोर बाहर लटके रहते थे।

c6.s21.4

१०३ पं० ब्रा०, १७।१।१४

c6.s21.5

१०४ ऐतरेय ब्रा०, ६।१

c6.s21.6

१०५ श० ब्रा०, ३।३।२।३

c6.s21.7

१०६ श० ब्रा०, ५।३।५।२३

c6.s21.8

१०७ मैत्रायणी सं०, ४।४।३

c6.s21.9

१०८ श० ब्रा०, ५।३।५।२३

c6.s21.10

१०९ कात्यायन श्रौ० सू०, २२।४

c6.s21.11

११० श० ब्रा०, ३।५।२० इत्यादि

जूते

c6.s22.1

प्राचीन संहिताओं में जूतों का कहीं उल्लेख नहीं आता। ऋग्वेद में आये बटूरिणापाद१११ से शायद लड़ाई में पैरों की रक्षा के लिए किसी आवरण से मतलब हो। पत्-संगिनी११२ का मतलब डा० सरकार के अनुसार११३ पैर में बांधी जाने वाली पट्टी से है जिसका व्यवहार पैदल सिपाही करते थे। उपानह् का सर्वप्रथम उल्लेख यजुर्वेद११४ अथर्ववेद११५ और ब्राह्मणों में११६ आया है। व्रात्य इसका व्यवहार करते थे११७। यज्ञ के अवसर पर पहनने के जूते सूअर के चमड़े से बनते थे११८।

c6.s22.2

१११ ऋ० वे०, १।१३३।२

c6.s22.3

११२ अ० वे०, ५।२१।१०

c6.s22.4

११३ सरकार, वही, पृ० ६१

c6.s22.5

११४ तै० सं०, ५।४।४।४

c6.s22.6

११५ अ० वे०, २०।१३३।४

c6.s22.7

११६ श० ब्रा०, ५।४।३।१९

c6.s22.8

११७ पञ्च० ब्रा०, १७।१४-१६

c6.s22.9

११८ श० ब्रा०, ५।४।३।१९

यज्ञ के अवसर पर नये कपड़े पहनने की प्रथा

c6.s23.1

यज्ञ के अवसर पर नये वस्त्र धारण करने की प्रथा थी। शतपथ के अनुसार११९ यह

c6.s23.2

११९ श० ब्रा०, ३।१।२।१९

c6.s23.3

वस्त्र शुद्ध गिना जाता था । यज्ञ का वस्त्र बिना कुंदी किया हुआ (आहत) होता था । प्रतिप्रस्थातृ इसलिए इसे अच्छी तरह पीटता था कि स्त्रियों द्वारा कातने (आकृणत्ति) और बुनने (वयति) में जो दोष वस्त्र में आ गये हों वे इस क्रिया से निकल जायं और वस्त्र यज्ञ के लिए शुद्ध हो जाय ।

यज्ञवस्त्रों में देवताओं का निवास

c6.s24.1

शतपथ के एक मंत्र से पता चलता है१२० कि यज्ञ के कपड़ों के भिन्न भिन्न भागों पर अलग अलग देवताओं के अधिकार होने का लोगों को विश्वास था। इस उल्लेख में कपड़े की बुनाई के बहुत से शब्द प्रसंगवश आ गये हैं। मंत्र के अनुसार बाने के देवता अग्नि हैं (अग्नेः पर्यासो), ताने का वायु (वायोः अनुक्षादो)। नीवि के पितृ, प्रघात के नाग, सूत (तन्तवः) के विश्वेदेवा, तथा आरोक (अलंकार) के अधिकारी नक्षत्र हैं। सब देवताओं के अधिकार होने से ही वस्त्र यजमान के योग्य होता है। तैत्तिरीय संहिता१२१ के एक मंत्र के अनुसार कपड़े के झालरदार किनारे (तूषाधानं) पर अग्नि का अधिकार होता था, वायु का वातपान पर तथा ताने (प्राचीनतान) और बाने (ओतु) पर क्रमशः आदित्यों और विश्वेदेवा के अधिकार होते थे। ऊपर के उद्धरणों से पता चलता है कि यज्ञ कार्य में आये हुए वस्त्रों की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना पड़ता था। वस्त्र के भिन्न भिन्न भागों में देवताओं के वास से शायद यह तात्पर्य हो कि इनसे पूत होने पर वस्त्रों पर न तो जादू टोने चल सकते थे और न उनमें भूतप्रेतों का ही प्रवेश हो सकता था।

c6.s24.2

१२० श० ब्रा०, ३।२।२।१८

c6.s24.3

१२१ तै० सं०, ४।१।१

भारतीय राजाओं की वेश-भूषा

c6.s25.1

यज्ञ विधि में जो सोम के कपड़ों का वर्णन शतपथ१२२ में आया है। वही पहरावा तत्कालीन भारतीय राजाओं का था। पूरी पोशाक में उपनहन (शायद धोती की तरह कोई कपड़ा अथवा जूता), पर्याणहन (चादर) और पगड़ी (उष्णीष) होते थे। पगड़ी न होने पर दो तीन अंगुल चौड़ी पट्टी से भी काम चल जा सकता था । राजसूय यज्ञ के समय तार्प्य पहनने के बाद राजा एक सफेद ऊनी कपड़ा (पाण्ड्वं) पहनता था। इसके वह एक चादर (अधिवास) से अपने को ढकता था और इसके बाद उष्णीष के छोर सामने की तह में खोंस लेता था ।१२३ उष्णीष ठीक ठीक कैसे बांधा जाता था इसके संबंध में टीकाकारों का एक मत नहीं है। एगलिंग१२४ का अनुमान है कि सिर पर पगड़ी की एक लपेट बांधी जाती थी और उसके दोनों

c6.s25.2

१२२ शतपथ ब्रा०, ३।३।२।३

c6.s25.3

१२३ शतपथ ब्रा०, ३।५।२०-२४

c6.s25.4

१२४ शतपथ ब्रा०, ३ भा०, पृ० ८६, फु० नो० २

c6.s25.5

छोर कंधों पर यज्ञोपवीत की तरह लटकते रहते थे और बाद में वे नाभि के पास शायद धोती में खोंस लिये जाते थे । इस यज्ञ में वस्त्र पहिनने की क्रिया लाक्षणिक रीति से गर्भ के आवरणों और प्रजनन की क्रियाओं के अभिव्यंजना के रूप में थी।१२५ कुछ यज्ञों में नीवि की चुन्नट खोल दी जाती थी१२६ (नीविमुद्वृष्य) । ऐसा क्यों किया जाता था यह तो ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता पर इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नीवि में चूनन डालने की प्रथा थी।

c6.s25.6

१२५ शत० ब्रा०, ३ भा०, पृ० ८३, फु० नो० ३

c6.s25.7

१२६ शत० ब्रा०, २।७।२।२४

c6.s25.8

राजवस्त्रों के उपरोक्त वर्णन से यह पता चलता है कि शतपथ के युग में राजे धोती, चादर और उष्णीष पहनते थे लेकिन इन वस्त्रों के पहनने का क्या ढंग था यह कहना सरल नहीं है ।

यज्ञ के अवसर पर स्त्रियों की वेश-भूषा

c6.s26.1

यज्ञ के समय स्त्रियों की वेश-भूषा का तो पूरा वर्णन नहीं मिला पर उनकी पोशाक में रसना का एक विशेष महत्व होता था। यज्ञ के अवसर पर अध्वर्यु यजमान की पत्नी की कमर में एक रस्सी बांधता था (योक्त्रेण सन्नह्यति) ।१२७ शतपथ के अनुसार इस क्रिया का लाक्षणिक अर्थ यह था कि स्त्री के नाभि से नीचे शरीर का भाग अपवित्र माना जाता था । यह रसना अधिवास के ऊपर बांधी जाती थी । ऐसा करने से स्त्री में पवित्रता कैसे आ जाती थी इसे शतपथ१२८ में बहुत घुमा फिरा कर समझाया गया है। शतपथ के अनुसार वस्त्र वनस्पति के प्रतीक हैं और रस्सी वरुणपाश की प्रतीक है और इसीलिए स्त्री की रक्षा के लिए उसके शरीर और वरुणपाश के बीच में औषधि यानी वस्त्र रखे गये हैं। सम्भवतः इस मंत्र में रसना के जादू भरे गुण और वस्त्रों के रक्षक शक्ति की ओर इशारा किया गया है।

c6.s26.2

१२७ शत० ब्रा०, १।३।१।१३

c6.s26.3

१२८ शत० ब्रा०, १।३।१।१५-१४

करधनी

c6.s27.1

करधनी को रसना कहा गया है ।१२९ यज्ञ के समय वरुण के अस्त्र होने की वजह से इसमें गांठ नहीं लगायी जाती थी । इसका कारण वरुण के अस्त्र के साथ छेड़खानी करने के नतीजे का डर हो सकता है । इससे यह भी पता चलता है कि साधारणतः रसना में गांठें लगती थीं।

c6.s27.2

१२९ श० ब्रा०, १।३।१।१५

रेशमी चंडातक

c6.s28.1

वाजपेय यज्ञ के अवसर पर१३० यजमान की पत्नी को कमर में लपेटे हुए दीक्षित वस्त्र के ऊपर कुश का बना हुआ चंडातक पहनना लाजमी था । यहां चंडातक और कुश के अर्थ जानने जरूरी हैं । सायण के अनुसार कुश शब्द कुश अथवा रेशम का द्योतक है और चंडातक रेशमी होता था (क्रिमिकोशविकारभूतवासः) । अगर कुश का अर्थ रेशमी वस्त्र ठीक है तो ई० पू० ७ वीं या ८ वीं शताब्दी में भी इस देश में रेशम का व्यवहार प्रचलित हो चुका था । ऐसा होना कुछ असंभव भी नहीं है क्योंकि पाणिनि के समय (ई० पू० ५ वीं शताब्दी) में तो रेशम चल चुका था । चंडातक और चलन एक ही होते थे । चंडातक को अर्धोरुक भी कहा गया है जो आधी जांघों तक आने वाला घांघरा जैसा कोई वस्त्र था और जिसे नर्तकियां पहना करती थीं। लगता है कि अर्धोरुक जांधिया या घघरी की तरह कोई वस्त्र था । इसका उल्लेख भी इस बात का प्रमाण है कि वैदिक युग में सिले हुए वस्त्रों का व्यवहार होता था ।

c6.s28.2

१३० श० ब्रा०, ५।२।१।८

व्रात्यों की वेश-भूषा

c6.s29.1

अभी यह तो ठीक ठीक से कहा नहीं जा सकता कि व्रात्य आर्यों के समाज से बहिष्कृत जन थे या इस देश के आदिवासी जिनके धार्मिक और सामाजिक विचार आर्यों से भिन्न थे । पंचविंश ब्राह्मण में प्रायश्चित्त के बाद इनके पुनः आर्य संस्कृति में लाये जाने का उल्लेख है । इसी प्रकरण में व्रात्यों के वस्त्रों पर भी कुछ प्रकाश डाला गया है। व्रात्यों के गृहपति उष्णीष, काली गोंट वाला कपड़ा (कृष्णसंवासः) बकरे की एक सफेद और दूसरी काली खाल (कृष्णावलक्षे अजिने) पहनते थे । इनके पास चाबुक (प्रतोद) बिना वाण वाले धनुष (शायद नावक के तीर या ब्लो पाइप से मतलब हो) और तख्तों के बने रथ (विपथश्च फलकास्तीर्णः) होते थे। इनके गले में निष्क नाम की मालाएं होती थीं १३१। इन गृहपतियों के अनुयायी व्रात्यों के वस्त्रों के किनारे (वलूकान्तानि) लाल होते थे और उनसे निकली छोरें वटी हुई होती थीं (दामतूषाणि) । वे जूते पहनते थे और बकरे की दो जुड़ी हुई खालें ओढ़ते थे १३२ । लाट्यायन श्रौत सूत्र१३३ में व्रात्यों को लाल उष्णीष, लाल वस्त्र (लोहित वाससो) और कुरते (उरुषोत) पहने बतलाया गया है। व्रात्य अपनी पगड़ी टेढ़ी बांधते थे (तिय्यंङ् नद्धं) १३४

c6.s29.2

१३१ पंचविंश ब्रा०, १७।१।१४

c6.s29.3

१३२ वही, १७।१।१५

c6.s29.4

१३३ ला० श्रौ० सू०, ८।५।८

c6.s29.5

१३४ वही, ८।६।७

c6.s29.6

सूत्रों के समय व्रात्यों के वस्त्रों के संबंध में सब आचार्य एक राय नहीं थे। शांडिल्य के१३५ अनुसार उनके वस्त्र काले न होकर चितकबरे होते थे। गौतम१३६ के अनुसार उनके वस्त्र सफेद (शुक्ल) होते थे और उनके किनारे काले (कृष्णदशं) होते थे।

c6.s29.7

१३५ वही, ८।६।१२

c6.s29.8

१३६ वही, ८।६।१३

c6.s29.9

उपरोक्त विवरण से पता चलता है कि व्रात्य शायद धोती पगड़ी और दो बकरे की खालें वस्त्र रूप में व्यवहार करते थे । साधारण श्रेणी का व्रात्य शायद लाल किनारे की धोती जिसमें बटी छीरें होती थीं, पगड़ी, दो बकरे की खालें और जूते पहनता था।

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