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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s12: पहनने के कपड़े

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s12

Language
Hindi

पहनने के कपड़े

c6.s12.1

ऋग्वेद५० और बाद के साहित्य में पहनने के कपड़ों के लिए साधारणतः वासस् शब्द का व्यवहार हुआ है। वसन५१ और वस्त्र५२ के भी वही माने होते हैं। वैदिक आर्य अपने कपड़े बड़े शौक से पहनते थे । सुवसन५३ का व्यवहार खूबसूरत कपड़ों तथा अच्छी तरह से पहने

c6.s12.2

५० ऋ० वे०, १।३४।१; १।११५।४; ८।३।२४

c6.s12.3

५१ ऋ० वे०, १।१६।७

c6.s12.4

५२ ऋ० वे०, १।२६।१

c6.s12.5

५३ ऋ० वे०, ६।५१।४

c6.s12.6

गये वस्त्र दोनों ही के लिए हुआ है५४। सुवासस्५५ विशेषण का प्रयोग अच्छे कपड़े पहनने वालों के लिए हुआ है। सुरभि५६ शब्द से पता चलता है कि पहनने के कपड़े बदन पर ठीक बैठते थे। समाज में बढ़िया कपड़े पहनने वालों के मान होने का उल्लेख शतपथ५७ में आया है। इस उल्लेख के अनुसार मनुष्य कपड़ा इसलिए पहनता है कि वह उसके बदन पर चमड़े की तरह शरीर की रक्षा का काम देता है। इसीलिए यह आवश्यक है कि मन से मनुष्य अच्छे कपड़े पहने (सुवासा एव बुभूषेत्)। अनेक रंग विरंगे कपड़े पहनने की भी प्रथा थी। शतपथ में अग्नि का एक पर्याय विभावसु५८ भी है जिसका अर्थ है रंग बिरंगे कपड़े पहनने वाला। कौषीतकी ब्राह्मण५९ में अच्छे कपड़े पहनने वाले युवकों का उल्लेख है।

c6.s12.7

५४ ऋ० वे०, ६।४७।५०

c6.s12.8

५५ ऋ० वे०, १।१२४।७; ३।८।४

c6.s12.9

५६ ऋ० वे०, ६।२९।३

c6.s12.10

५७ श० ब्रा०, ३।१।२।१६

c6.s12.11

५८ श० ब्रा०, ६।४।४।८

c6.s12.12

५९ कौ० ब्रा०, १०।२

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